अमेरिकी ऊर्जा नीति में बड़ा बदलाव : ट्रंप ने रूस-ईरान पर लगने वाले कड़े टैरिफ और पाबंदियों को रोका, भारत और चीन को मिली बड़ी राहत

वॉशिंगटन (एजेंसी)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान से संबंधित प्रतिबंधों, अतिरिक्त शुल्कों और आयात पाबंदियों को लागू न करने का एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने इस कदम को अमेरिका के ‘राष्ट्रीय हित’ में बताया और इस संबंध में संसद (अमेरिकी कांग्रेस) को औपचारिक प्रमाणपत्र भी सौंप दिया है।
अमेरिकी संसद द्वारा पारित ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026’ के प्रभावी होने से ठीक एक दिन पहले यह घोषणा की गई। इस कानून की समयसीमा 18 अक्टूबर को समाप्त हो रही थी। ट्रंप के इस फैसले से रूस से ऊर्जा उत्पाद खरीदने वाले भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अज़रबैजान जैसे देशों को भारी आर्थिक दबाव से तात्कालिक राहत मिली है।
फैसले के पीछे के मुख्य कारण और हालिया घटनाक्रम
रूस के साथ डीजल समझौता:
हाल ही में वाशिंगटन और मॉस्को के बीच एक बड़ा व्यापारिक समझौता हुआ है, जिसके तहत रूस अमेरिका को आपातकालीन स्थिति में 3 लाख टन से अधिक डीजल की आपूर्ति करेगा। भविष्य में भी कई किश्तों में आपूर्ति का प्रावधान है।
यूक्रेन की प्रतिक्रिया:
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने इस समझौते को अमेरिकी रुख की कमजोरी बताया और कड़ी आलोचना की। दूसरी ओर, राष्ट्रपति ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से जेलेंस्की के नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं।
कानून के कड़े प्रावधान:
ग्राहम कानून के तहत रूसी तेल खरीदने वाले देशों के अमेरिकी आयात पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने और रूसी ऊर्जा उत्पादों पर 500 प्रतिशत तक आयात शुल्क बढ़ाने का प्रावधान था। ट्रंप के नए कार्यकारी आदेश ने इन सभी कठोर धाराओं के क्रियान्वयन को फिलहाल रोक दिया है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह कदम?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और 1.4 अरब नागरिकों की सुरक्षा के लिए रूस से कच्चे तेल का आयात करता रहा है। यदि अमेरिकी प्रशासन भारत पर अतिरिक्त 100% टैरिफ लागू करता, तो भारतीय निर्यात और द्विपक्षीय व्यापार संबंधों पर भारी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता था।
भारत के विदेश मंत्रालय ने पहले भी यह स्पष्ट कर दिया था कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि है और भारत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से अपनी जरूरतों के अनुसार निर्णय लेता रहेगा। ट्रंप के इस आदेश से भारतीय अर्थव्यवस्था और वैश्विक आपूर्ति शृंखला दोनों को स्थिरता मिलेगी।
















