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इस साल जल्दी भिगोएगा मानसून : 25 मई के बाद केरल में दस्तक की संभावना

नई दिल्ली (एजेंसी)। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताज़ा अनुमानों के अनुसार, इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून अपने सामान्य समय से करीब एक सप्ताह पहले भारत में प्रवेश कर सकता है। बंगाल की खाड़ी में सक्रिय मौसमी हलचल के कारण मानसून के 25 से 27 मई के बीच केरल तट पर पहुंचने की उम्मीद है। वहीं, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में इसकी सक्रियता 16 मई तक शुरू हो सकती है।

मानसून की जल्दी आवक के कारण

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, श्रीलंका तट के पास बने कम दबाव के क्षेत्र के उत्तर की ओर बढ़ने से स्थितियां अनुकूल हुई हैं। भूमध्य रेखा से आने वाली नमी युक्त हवाओं के जोर पकड़ने से अंडमान सागर और बंगाल की खाड़ी के दक्षिणी हिस्सों में मानसून की शुरुआत सामान्य से चार दिन पहले होने के संकेत हैं।

आमतौर पर मानसून 1 जून को केरल पहुंचता है, लेकिन इस बार बंगाल की खाड़ी का सिस्टम इसे तेजी से आगे बढ़ा रहा है। पिछले साल भी मानसून ने ऐसी ही फुर्ती दिखाई थी और 24 मई तक केरल पहुंच गया था।

उत्तर भारत में मौसम के दो रंग

एक ओर जहां दक्षिण भारत में मानसून की आहट है, वहीं उत्तर और मध्य भारत भीषण गर्मी की चपेट में हैं:

राजस्थान: बाड़मेर में पारा 48.3°C तक जा पहुंचा है।

उत्तर प्रदेश: धूल भरी आंधी और गरज के साथ बारिश ने जनजीवन प्रभावित किया है। मंगलवार को कई जिलों में आंधी के कारण पेड़ उखड़ने और बिजली गिरने की घटनाएं सामने आईं।

पहाड़ी राज्य: हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी आंधी-तूफान का अलर्ट जारी किया गया है।

बदलता पैटर्न: खेती और शहरों के लिए चुनौती

जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का पारंपरिक चक्र अब अस्थिर होता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्र के बढ़ते तापमान और ‘अल नीनो’ व ‘ला नीना’ जैसी घटनाओं के कारण अब बारिश का वितरण असमान हो गया है।

कृषि पर संकट: धान और मक्का जैसी खरीफ फसलों की बुवाई पूरी तरह मानसून पर निर्भर है। कभी लंबे सूखे तो कभी अचानक अत्यधिक बारिश से फसलों के नष्ट होने का खतरा बढ़ गया है।

शहरी जलभराव: कम समय में बहुत अधिक बारिश होने से बड़े शहरों की ड्रेनेज व्यवस्था फेल हो रही है, जिससे ‘अर्बन फ्लडिंग’ की समस्या बढ़ रही है।

जल प्रबंधन: बारिश के समय में बदलाव के कारण बांधों और जलाशयों में पानी का भंडारण करना चुनौतीपूर्ण हो गया है, जिसका सीधा असर बिजली उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर पड़ता है।

वैज्ञानिक शोध और भविष्य की रणनीति

भारतीय भू-चुंबकत्व संस्थान के एक हालिया अध्ययन में पाया गया है कि बादलों और हवाओं की दिशा में बदलाव आ रहा है। कोल्हापुर क्षेत्र में किए गए शोध के अनुसार, बादलों की गति अब दक्षिण-पश्चिम की ओर अधिक झुक रही है, जो भविष्य में वर्षा के स्वरूप में बड़े बदलाव का संकेत है।

वैज्ञानिकों का सुझाव है कि अब हमें पुरानी पद्धतियों को छोड़कर नई रणनीतियां अपनानी होंगी:

सटीक पूर्वानुमान प्रणाली को और बेहतर बनाना।

सूखा और बाढ़ प्रतिरोधी फसलों की किस्मों को बढ़ावा देना।

शहरों में मजबूत जल निकासी और जल संरक्षण की योजनाओं पर काम करना।

बदलते मौसम के मिजाज को देखते हुए समय रहते तैयारी करना देश की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए अनिवार्य हो गया है।

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