छत्तीसगढ़

बलौदाबाजार हिंसा : अमित बघेल और अन्य दो की जमानत याचिका हाईकोर्ट से खारिज, कोर्ट ने कहा ‘अक्षम्य है ऐसा कृत्य’

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार में हुई भीषण आगजनी और हिंसा के मामले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने मामले के मुख्य आरोपियों में शामिल छत्तीसगढ़ क्रांति सेना के प्रमुख अमित बघेल सहित तीन लोगों की नियमित जमानत अर्जियों को सिरे से खारिज कर दिया है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एन.के. व्यास की एकल पीठ ने साफ किया कि सामाजिक शांति को दांव पर लगाने वाले और सरकारी संपत्तियों को फूंकने वाले तत्वों को किसी भी सूरत में राहत नहीं दी जा सकती।

कानून व्यवस्था बिगाड़ने पर कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द का हवाला देते हुए बेहद गंभीर टिप्पणियां कीं। अदालत ने कहा कि:

भीड़ को उकसाना गंभीर अपराध: आरोपियों ने हजारों की तादाद में एकत्र लोगों को भड़काया, जिससे हिंसा भड़की।

करोड़ों का नुकसान: इस सुनियोजित उपद्रव के कारण सरकारी और निजी संपत्तियों को करीब 13 से 14 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ा।

खाकी पर हमला: ऑन-ड्यूटी पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमला कर कानून को हाथ में लिया गया।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे संगीन मामलों में जहां सरेआम कलेक्ट्रेट को आग के हवाले कर दिया गया हो, वहां आरोपियों को जमानत का लाभ देना समाज में गलत संदेश भेजेगा।

क्या था पूरा घटनाक्रम?

यह पूरा विवाद 10 जून 2024 का है, जब बलौदाबाजार के दशहरा मैदान में एक सामाजिक मुद्दे को लेकर विशाल जनसभा बुलाई गई थी। पुलिस जांच के अनुसार, छत्तीसगढ़ क्रांति सेना के पदाधिकारियों ने मंच से बेहद उत्तेजक भाषण दिए, जिससे वहां मौजूद भीड़ बेकाबू हो गई। उग्र उपद्रवियों ने सुरक्षा घेरे (बैरिकेड्स) को तोड़ते हुए कलेक्ट्रेट और एसपी कार्यालय के भीतर प्रवेश किया। इसके बाद कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद सैकड़ों वाहनों को आग लगा दी गई और मुख्य इमारत को फूंक दिया गया। इस दौरान जब पुलिस बल ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो उन पर पत्थरों, लाठियों और लोहे के रॉड से प्राणघातक हमला किया गया, जिसमें कई सुरक्षाकर्मी लहूलुहान हुए थे।

कोर्ट ने खारिज किया ‘अलबाई’ (घटनास्थल पर न होने) का दावा

मामले के मुख्य आरोपी अमित बघेल के वकील ने कोर्ट में दलील दी थी कि हिंसा के वक्त उनके मुवक्किल घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं थे। बचाव पक्ष का दावा था कि दोपहर 12 से 3 बजे के बीच अमित बघेल अपनी पत्नी की किसी जमीन की रजिस्ट्री के सिलसिले में रजिस्ट्रार दफ्तर में थे।

हाईकोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह से अमान्य घोषित कर दिया। अदालत ने केस डायरी और सबूतों का अवलोकन करने के बाद कहा कि पेश किए गए दस्तावेजों से यह कतई साबित नहीं होता कि हिंसा के वक्त अमित बघेल रजिस्ट्रार कार्यालय में थे। कोर्ट ने इस दावे को खोखला और सच्चाई से परे बताते हुए अमित बघेल, अजय यादव और दिनेश वर्मा की याचिकाओं को खारिज कर दिया।

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