छत्तीसगढ़

संघर्ष से शिखर तक : राष्ट्रीय फलक पर चमका सुकमा का मिनपा स्वास्थ्य केंद्र

रायपुर। छत्तीसगढ़ का मिनपा इलाका कभी अपनी भौगोलिक विषमताओं, घने जंगलों और नक्सली साए के कारण मुख्यधारा से कटा हुआ था। ऐसे दुर्गम क्षेत्र में बुनियादी चिकित्सा सुविधाएं पहुंचाना किसी चुनौती से कम नहीं था। शुरुआत बेहद मामूली थी—एक अदनी सी झोपड़ी से यहां स्वास्थ्य सेवाओं का आगाज़ हुआ। संसाधनों की भारी किल्लत के बाद भी चिकित्सा कर्मियों का हौसला नहीं डगमगाया। उन्होंने हार मानने के बजाय हर घर तक दस्तक दी, लगातार मेडिकल कैंप लगाए और आदिवासियों को सेहत के प्रति जागरूक किया।

बदलाव की नई बयार और आधुनिक सुविधाएं

हाल के वर्षों में शासन की जनकल्याणकारी नीतियों और प्रशासनिक मुस्तैदी से इस सुदूर अंचल की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। साल 2024 में यहां एक सर्वसुविधायुक्त उप स्वास्थ्य केंद्र की इमारत खड़ी की गई। आज इस केंद्र में आधुनिक मेडिकल उपकरण, जांच के लिए लैबोरेटरी और जरूरी स्टाफ मौजूद है।

यह अस्पताल अब केवल एक इमारत नहीं, बल्कि आस-पास के कई दूरदराज के गांवों जैसे:

दुलेड़ और एलमागुंडा

भटपाड़ और पोट्टेमडगू

टोंडामरका और गुंडराजपाड़

के करीब 3,500 से अधिक ग्रामीणों के लिए संकटमोचक साबित हो रहा है।

फर्ज के आगे फीकी पड़ीं मुश्किलें: ‘नाइट कैंप’ की अनूठी पहल

इस कामयाबी के पीछे ग्राउंड जीरो पर तैनात कोरोना वॉरियर्स और स्वास्थ्य कर्मियों का अटूट जज्बा है। इन पहुंचविहीन गांवों तक जाने का रास्ता कंटीले जंगलों और पथरीले रास्तों से होकर गुजरता है। कई बार दूरी और खराब रास्तों की वजह से टीम का एक ही दिन में लौट पाना नामुमकिन हो जाता है। ऐसे में ये कर्मचारी पीछे नहीं हटते, बल्कि गांवों में ही रात गुजारते हैं। इन ‘नाईट कैंप्स’ के जरिए वे रात के वक्त भी पीड़ितों का इलाज करते हैं।

सकारात्मक परिणाम:

इसी निष्ठा का असर है कि आज अस्पताल की ओपीडी में हर दिन 15 से 20 मरीज पहुंच रहे हैं। सबसे सुखद बदलाव यह है कि यहां हर महीने औसतन 4 सुरक्षित और संस्थागत प्रसव (Institutional Deliveries) हो रहे हैं, जिससे नवजात और माताओं की सेहत सुरक्षित हुई है।

मिला राष्ट्रीय गौरव: NQAS का तमगा

मिनपा उप स्वास्थ्य केंद्र की इस बेमिसाल लगन को अब देश स्तर पर सराहा गया है। 15 मई 2026 को इस केंद्र ने ‘राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक’ (NQAS) के कड़े पैमानों को सफलतापूर्वक पार कर देश में अपनी एक खास पहचान बनाई है। यह गौरव हासिल करने में स्थानीय मितानिन, एएनएम, सीएचओ, सुपरवाइजर, सेक्टर मेडिकल ऑफिसर और जिला प्रशासन के कलेक्टिव एफर्ट्स का सबसे बड़ा योगदान है।

एक झोपड़ी से शुरू होकर राष्ट्रीय स्तर के मापदंडों को छूने का यह सफर यह साबित करता है कि अगर इरादे मजबूत हों और सरकारी योजनाओं का सही क्रियान्वयन किया जाए, तो घने जंगलों के बीच भी विकास का उजाला फैलाया जा सकता है।

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