एम.ए. पास युवा ने बदला खेती का ढर्रा : जैविक कृषि से सालाना कमा रहे ₹8 लाख, बने ग्रामीणों के रोल मॉडल

कांकेर। कहा जाता है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो दुर्गम राहें भी आसान हो जाती हैं। इस बात को पूरी तरह सच साबित कर दिखाया है छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के ग्राम चिचगांव (आमाबेड़ा तहसील) निवासी प्रगतिशील कृषक सोनूराम ध्रुव ने। कभी माओवाद के साये में रहे इस सुदूर वन क्षेत्र के रहने वाले सोनूराम ने उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद सरकारी नौकरी के पारंपरिक रास्ते को नहीं चुना, बल्कि अपनी पैतृक भूमि को समृद्ध बनाने का संकल्प लिया। आज वे अपनी आधुनिक सोच और सरकारी योजनाओं के बेहतर तालमेल से पूरे क्षेत्र में सफलता की नई मिसाल पेश कर रहे हैं।
डिग्री का खेती में इस्तेमाल: परंपरागत ढर्रे को दी चुनौती
अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर (M.A.) की उपाधि प्राप्त सोनूराम ने अपनी शिक्षा का उपयोग नौकरी की तलाश करने के बजाय कृषि अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में किया। उन्होंने अपनी लगभग 10 एकड़ की कृषि भूमि पर लकीर का फकीर बनने के बजाय आधुनिक तकनीक और जैविक पद्धतियों को प्राथमिकता दी। इसी का नतीजा है कि आज वे एक सफल और आत्मनिर्भर किसान के रूप में पहचान बना चुके हैं।
वर्ष 2015 से सफर की शुरुआत, अब मिला ‘प्रमाणित जैविक कृषक’ का दर्जा
सोनूराम ने करीब 11 वर्ष पहले, साल 2015 में प्राकृतिक कृषि की राह चुनी थी। शुरुआती दौर की चुनौतियों को पार करते हुए उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (NPOP) के तहत मान्यता प्राप्त की। अब वे छत्तीसगढ़ प्रमाणीकरण समिति (CGOCERT) और भारत वानिकी एवं कृषि द्वारा प्रमाणित एक आधिकारिक जैविक किसान हैं।
टपक सिंचाई और एकीकृत कृषि (Integrated Farming) से बदली तकदीर
अपनी 10 एकड़ जमीन पर सोनूराम ने एकीकृत कृषि प्रणाली को लागू किया है, जिसके तहत वे एक साथ कई तरह की फसलें और गतिविधियां संचालित करते हैं:
सुगंधित और औषधीय धान: वे लगभग 4 एकड़ क्षेत्र में पूरी तरह रासायनिक खाद मुक्त, सुगंधित चिन्नौर धान और औषधीय गुणों से भरपूर ब्लैक राइस (काला धान) की खेती करते हैं।
नकदी व मसाला फसलें: इस सीजन में उन्होंने काली मिर्च के 400 पौधे लगाए हैं, जिनमें पैदावार शुरू हो चुकी है। इसके साथ ही वे गेहूं, रागी, उड़द, कुल्थी और औषधीय महत्व वाली काली हल्दी भी उगा रहे हैं।
पशुपालन व बागवानी: फसलों के अलावा वे आम के बगीचे की देखरेख और गौ-पालन भी करते हैं, जिससे खेत के लिए जरूरी खाद घर पर ही मिल जाती है।
स्मार्ट वॉटर मैनेजमेंट: पानी की बचत और सही उपयोग के लिए उन्होंने खेतों में ड्रिप इरिगेशन (टपक सिंचाई) सिस्टम लगाया है, जिससे कम पानी में भी बंपर पैदावार हो रही है।
‘वृक्ष आयुर्वेद’ और घरेलू संसाधनों का अनूठा संगम
सोनूराम अपनी खेती में ताराचंद बेलजी की प्रसिद्ध तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, जो वृक्ष आयुर्वेद पर आधारित है। यह पद्धति प्रकृति के ‘पंचमहाभूत’ (भूमि, गगन, वायु, अग्नि और जल) के संतुलन पर काम करती है। उनका मानना है कि प्रकृति के नियमों के अनुसार की गई खेती से न सिर्फ भूमि उपजाऊ बनी रहती है, बल्कि फसल की गुणवत्ता भी बेहतरीन होती है।
वे बाजार के महंगे और हानिकारक रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भर नहीं हैं। इसके बजाय वे अपने आस-पास मिलने वाले प्राकृतिक संसाधनों जैसे नींबू, पपीता, हर्रा और वनस्पतियों की मदद से खुद ही जीवामृत, जैविक घोल और कीटनाशक तैयार करते हैं, जिससे खेती की लागत में भारी कमी आई है।
सॉइल हेल्थ कार्ड से सुधारी मिट्टी, ₹150 किलो बिक रहा चावल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘कम लागत, अधिक लाभ’ के विजन से प्रेरित होकर सोनूराम ने जैविक खेती को बड़े पैमाने पर अपनाया। जब सॉइल हेल्थ कार्ड की जांच में उनकी जमीन में कार्बन की कमी पाई गई, तो उन्होंने खेत में तिल की बुवाई शुरू की और फसल के अवशेषों को मिट्टी में ही मिला दिया। इससे भूमि का पीएच (pH) स्तर और जैविक कार्बन संतुलित हो गया।
आज वे खरीफ सीजन में प्रति एकड़ करीब 20 क्विंटल धान का उत्पादन ले रहे हैं। उनका पूरी तरह से आर्गेनिक चिन्नौर चावल बाजार में ₹150 प्रति किलोग्राम की ऊंची कीमत पर हाथों-हाथ बिकता है। इस तरह, पूरे परिवार के सहयोग और विविध कृषि गतिविधियों से वे हर साल ₹8 लाख से अधिक का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं।
वनांचल के अन्य किसानों के लिए बने मार्गदर्शक
कभी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसने वाले पिछड़े इलाके में रहकर सोनूराम ने यह साबित कर दिया है कि अगर वैज्ञानिक नजरिया और कड़ी मेहनत का मेल हो, तो ग्रामीण क्षेत्रों में भी खुशहाली लाई जा सकती है। वर्तमान में वे अपने क्षेत्र के दर्जनों अन्य किसानों को भी रासायनिक खेती छोड़ने और पर्यावरण-अनुकूल जैविक कृषि अपनाने के लिए प्रेरित और प्रशिक्षित कर रहे हैं।
















