छत्तीसगढ़

अटल विश्वविद्यालय में जनजातीय गौरव का उदय : बिरसा मुंडा और रानी दुर्गावती की प्रतिमाओं का लोकार्पण

बिलासपुर। अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय के कोनी स्थित नवनिर्मित प्रशासनिक परिसर में एक ऐतिहासिक अध्याय का सूत्रपात हुआ। विश्वविद्यालय ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूती देते हुए स्वाधीनता संग्राम के महानायक भगवान बिरसा मुंडा और शौर्य की प्रतीक रानी दुर्गावती की प्रतिमाओं का भव्य अनावरण किया। यह आयोजन केवल पत्थर की मूर्तियों की स्थापना तक सीमित नहीं था, बल्कि यह भावी पीढ़ी को देश के वास्तविक नायकों के संघर्ष से परिचित कराने का एक बौद्धिक प्रयास रहा।

प्रेरणापुंज हैं हमारे महानायक: कुलपति

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. (डॉ.) एल.पी. पटेरिया ने प्रतिमाओं का अनावरण करते हुए इसे विश्वविद्यालय के लिए एक वैचारिक उपलब्धि बताया। उन्होंने जोर देकर कहा:

“भगवान बिरसा मुंडा और रानी दुर्गावती का जीवन केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि हमारे शोध और चिंतन का आधार होना चाहिए।”

रामचरितमानस के माध्यम से ‘परोपकार’ के महत्व को समझाते हुए उन्होंने छात्रों और शोधार्थियों से आग्रह किया कि वे इन महानायकों के जीवन मूल्यों को अपने अकादमिक कार्यों और व्यवहार में उतारें।

सांस्कृतिक और शैक्षणिक चेतना का संगम

विश्वविद्यालय के कुलसचिव तरणीश गौतम ने इस पहल को संस्थान की ‘सांस्कृतिक रीढ़’ की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि एक शैक्षणिक संस्थान का दायित्व केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि सामाजिक गौरव और राष्ट्रीय अस्मिता का संरक्षण करना भी है।

कार्यक्रम के दौरान विभिन्न विभागों के प्रमुखों ने भी अपने विचार साझा किए:

डॉ. एच.एस. होता (अधिष्ठाता, कंप्यूटर साइंस): तकनीकी प्रगति और ऐतिहासिक बोध के बीच संतुलन की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. अतुल दुबे (अधिष्ठाता, वाणिज्य): रानी दुर्गावती और बिरसा मुंडा के जीवन को आधुनिक प्रबंधन और नेतृत्व क्षमता के पाठ के रूप में प्रस्तुत किया।

डॉ. कलाधर (अधिष्ठाता, जैव प्रौद्योगिकी): उन्होंने इस आयोजन को युवाओं में अनुसंधान की नई संस्कृति विकसित करने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया।

गरिमामय आयोजन और अनुशासन

इंजीनियरिंग विभाग के नेतृत्व में कार्यक्रम का प्रबंधन अत्यंत व्यवस्थित रहा। परिसर की स्वच्छता और कार्यक्रम की मर्यादा ने आगंतुकों को विशेष रूप से प्रभावित किया। यह समारोह न केवल एक स्मृति उत्सव बनकर उभरा, बल्कि विश्वविद्यालय के अनुशासित और बौद्धिक वातावरण का जीवंत उदाहरण भी सिद्ध हुआ।

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