छत्तीसगढ़ में बिजली की कीमतों में भारी उछाल की संभावना : क्या आम जनता पर बढ़ेगा बोझ?

रायपुर। छत्तीसगढ़ के बिजली उपभोक्ताओं के लिए आने वाला समय आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। राज्य की बिजली कंपनियों ने भारी घाटे का हवाला देते हुए नया टैरिफ प्लान पेश किया है, जिससे बिजली की दरों में 20 प्रतिशत तक की वृद्धि होने के आसार हैं।
घाटे की भरपाई और सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पावर कंपनी के एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय दिया था, जिसमें कहा गया था कि पावर कंपनियों के घाटे की वसूली एक बार में ही की जानी चाहिए। इसी के आधार पर राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल ने सभी राज्यों को दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ राज्य पावर कंपनी ने 6300 करोड़ रुपये के संचयी घाटे का विवरण देते हुए बिजली नियामक आयोग के समक्ष याचिका दायर की है।
आय-व्यय का गणित
कंपनी द्वारा सत्र 2026-27 के लिए प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार:
अनुमानित राजस्व: ₹26,216 करोड़ (वर्तमान दरों पर)
अनुमानित वार्षिक खर्च: ₹25,460 करोड़
परिचालन लाभ: ₹756 करोड़
हालांकि, कंपनी का कहना है कि चालू सत्र में लाभ होने के बावजूद, पिछले वर्षों का बकाया घाटा इतना अधिक है कि उसे समायोजित करने के बाद भी 6300 करोड़ रुपये की कमी बनी रहेगी।
सब्सिडी ही एकमात्र सहारा?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नियामक आयोग इस घाटे को कम करके 5000 करोड़ रुपये भी स्वीकार करता है, तो भी दरों में 20% की बढ़ोतरी अनिवार्य हो जाएगी। जनता को इस बोझ से बचाने का एकमात्र रास्ता राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी है। यदि सरकार वित्तीय सहायता प्रदान नहीं करती है, तो बिजली की कीमतें सीधे तौर पर घाटे के अनुपात में बढ़ेंगी।
नियामक आयोग के सामने चुनौतियां
बिजली नियामक आयोग वर्तमान में जनसुनवाई और दस्तावेजों की जांच कर रहा है। आयोग के पास दो मुख्य विकल्प हैं:
किस्तों में वसूली: घाटे को तीन साल की किस्तों में बांटा जाए। हालांकि, ऐसा करने से केंद्र सरकार की RDSS योजना के तहत मिलने वाली करोड़ों की मदद रुक सकती है।
एकमुश्त बढ़ोतरी: सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए दरों में बड़ी वृद्धि की जाए।
निष्कर्ष: बिजली की नई दरें क्या होंगी, यह पूरी तरह से आयोग के फैसले और राज्य सरकार के सब्सिडी संबंधी रुख पर निर्भर करेगा।
















