अंतरराष्ट्रीय तनाव से कच्चे तेल में उबाल : क्या भारत में महँगा होगा पेट्रोल-डीजल?

नई दिल्ली (एजेंसी)। वैश्विक स्तर पर गहराते भू-राजनीतिक तनाव और खाड़ी देशों में युद्ध की स्थिति ने कच्चे तेल (Crude Oil) के बाजार में आग लगा दी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिसका सीधा असर भारतीय तेल कंपनियों के मुनाफे पर दिखने लगा है। शुक्रवार को कच्चे तेल की कीमत 136.56 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई, जो भारतीय रिफाइनरियों के लिए लागत में लगभग 93% की भारी बढ़ोतरी दर्शाती है।
मुनाफे पर दबाव, पर कीमतें स्थिर
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने इंडियन ऑयल (IOC), HPCL और BPCL जैसी दिग्गज सरकारी कंपनियों के साथ-साथ रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रॉफिट मार्जिन को बुरी तरह प्रभावित किया है। जहाँ अमेरिका जैसे देशों में तेल की खुदरा कीमतें बढ़ चुकी हैं, वहीं भारत में फिलहाल राहत बनी हुई है। दिल्ली और मुंबई सहित प्रमुख शहरों में पेट्रोल-डीजल के दाम अभी भी पुराने स्तर पर ही टिके हुए हैं।
चुनावी समीकरण और सरकारी रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि कीमतों में स्थिरता के पीछे दो मुख्य कारण हैं:
राजकोषीय लक्ष्य: सरकार 31 मार्च तक बजट लक्ष्यों को संतुलित रखने के लिए करों या कीमतों में बड़े बदलाव से बच रही है।
विधानसभा चुनाव: चार राज्यों और पुडुचेरी में चल रही चुनावी प्रक्रिया के कारण 29 अप्रैल (अंतिम चरण के मतदान) तक कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना कम है।
होर्मुज जलडमरूमध्य: संकट की असली जड़
वैश्विक तेल आपूर्ति में आई इस कमी का सबसे बड़ा कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में पैदा हुआ गतिरोध है। ईरान द्वारा इस मार्ग को बाधित किए जाने से दुनिया की 20% तेल और गैस सप्लाई रुक गई है। भारत के लिए यह स्थिति और भी चिंताजनक है क्योंकि देश की कुल प्रसंस्कृत ऊर्जा का 60% हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर आता है। रूस से मिलने वाले रियायती तेल की कीमतें बढ़ने से भारत की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
अर्थव्यवस्था पर मंडराते बादल
आर्थिक जानकारों ने इस संकट के दूरगामी परिणामों की चेतावनी दी है:
आयात बिल में उछाल: पीएम की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य नीलकंठ मिश्रा के अनुसार, यदि तेल साल भर $100 के ऊपर रहता है, तो भारत के व्यापार संतुलन को 80 अरब डॉलर (GDP का 2.1%) का नुकसान हो सकता है।
बढ़ता घाटा: रेटिंग एजेंसी ICRA का अनुमान है कि कच्चे तेल में प्रति 10 डॉलर की वृद्धि भारत के चालू खाता घाटे (CAD) को 30-40 बेसिस पॉइंट बढ़ा देती है।
वैश्विक मंदी का डर: हार्वर्ड की प्रोफेसर गीता गोपीनाथ ने आगाह किया है कि यदि 2026 में औसत कीमत 85 डॉलर भी रहती है, तो वैश्विक विकास दर में गिरावट आएगी और महंगाई (Inflation) में तेजी से इजाफा होगा।
















