छत्तीसगढ़

कथनी और करनी में अंतर : शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने सत्ताधारियों को घेरा

बिलासपुर। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने हालिया बिलासपुर प्रवास के दौरान राजनीति और धर्म के अंतर्संबंधों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि आज के राजनेताओं के वादों और उनके जमीनी कार्यों में जमीन-आसमान का फर्क है।

गौरक्षा और राजनीति पर प्रहार

शंकराचार्य ने गौ संरक्षण के मुद्दे पर केंद्र और राज्यों की सत्ताधारी पार्टियों को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि जब नेता कैमरे के सामने होते हैं, तो उनके सुर बदल जाते हैं, लेकिन धरातल पर गायों की स्थिति जस की तस बनी हुई है। उनके मुख्य बिंदु निम्नलिखित रहे:

दोहरा मापदंड: राजनेता केवल वोट पाने के लिए गौरक्षा का नाम लेते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाते।

विरोध को दबाने की कोशिश: उन्होंने आरोप लगाया कि जब वे गौरक्षा जैसे मौलिक सवाल उठाते हैं, तो उनकी आवाज दबाने के लिए आपराधिक छवि वाले लोगों (हिस्ट्रीशीटरों) का सहारा लिया जाता है।

“असली हिंदू” की परिभाषा पर छिड़ी बहस

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संदर्भ में पूछे गए एक सवाल पर शंकराचार्य ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म केवल पहचान नहीं, बल्कि आचरण का विषय है।

“हमने स्वयं को सिद्ध करने के लिए 40 दिनों का समय दिया था, लेकिन उस समयावधि में प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए गए। जो व्यक्ति गौ माता के नाम पर वोट लेकर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता, वह सच्चे हिंदू धर्म के आदर्शों पर खरा नहीं उतरता।”

उन्होंने आगे जोड़ा कि उनके किसी व्यक्ति विशेष से व्यक्तिगत मतभेद नहीं हैं, बल्कि उनका विरोध केवल उन नीतियों और मंशा से है जो हिंदू समाज के हित में नहीं हैं।

सनातन धर्म को ‘भीतरी’ खतरा

सनातन धर्म की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि हिंदू धर्म को बाहरी दुश्मनों से उतना खतरा नहीं है, जितना कि समाज के भीतर छिपे ‘कालनेमियों’ (कपटियों) से है। उन्होंने आगाह किया कि जो लोग सनातन का चोला पहनकर धर्म को नुकसान पहुँचा रहे हैं, उनसे सावधान रहने की आवश्यकता है।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने यूजीसी (UGC) के नवीन नियमों की भी आलोचना की और उन्हें समाज को विभाजित करने वाला कदम बताया। उन्होंने इन नियमों को राष्ट्रहित के विरुद्ध बताते हुए इन्हें तुरंत वापस लेने की मांग की।

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