बंदूक छोड़ अब हाथ में नियुक्ति पत्र, मुख्यधारा में लौटने की एक नई इबारत

कांकेर। मानव समाज की सबसे बड़ी जीत तब होती है जब कोई व्यक्ति हिंसा का रास्ता छोड़कर विकास और सकारात्मकता की ओर कदम बढ़ाता है। छत्तीसगढ़ के उत्तर बस्तर कांकेर जिले में आज कुछ ऐसा ही सुखद बदलाव देखने को मिल रहा है। जिला प्रशासन की अनूठी पहल के चलते अब आत्मसमर्पित पूर्व माओवादी न केवल मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं, बल्कि प्रशिक्षण प्राप्त कर सम्मानजनक रोजगार भी हासिल कर रहे हैं।
विशेष बात यह है कि कांकेर, बस्तर संभाग का ऐसा पहला जिला बन गया है जिसने पुनर्वास नीति के तहत प्रशिक्षण देने के साथ-साथ युवाओं को निजी क्षेत्रों में प्लेसमेंट (रोजगार) भी उपलब्ध कराया है।
प्रशिक्षण से आत्मनिर्भरता तक का सफर
भानुप्रतापपुर के ग्राम मुल्ला (चौगेल) स्थित विशेष कैंप में इन युवाओं को विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का प्रशिक्षण दिया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य उन्हें कौशल प्रदान कर समाज की आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना था।
आज की बड़ी उपलब्धि:
नियुक्ति पत्र वितरण: कलेक्टर श्री निलेशकुमार महादेव क्षीरसागर और जिला पंचायत सीईओ श्री हरेश मंडावी ने 04 युवाओं को निजी कंपनियों के नियुक्ति पत्र सौंपे।
लाभार्थी: इसमें आत्मसमर्पित सगनूराम आंचला सहित नक्सल पीड़ित रोशन नेताम, बीरसिंह मंडावी और संजय नेताम शामिल हैं।
आर्थिक सुरक्षा: इन युवाओं को अब 15,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय के साथ अन्य वित्तीय सुविधाएं मिलेंगी।
“असली खुशी अब मिली” – लाभार्थियों के अनुभव
प्रशिक्षण के बाद नई जिंदगी शुरू कर रहे युवाओं ने अपनी भावनाओं को साझा करते हुए शासन की नीति की सराहना की:
“शिक्षा की कमी और सही-गलत की समझ न होने के कारण मैं गलत रास्ते पर चला गया था। लेकिन मुख्यधारा में लौटने के बाद समझ आया कि मनुष्य के जीवन की असली अहमियत क्या है। शासन ने हमें जीने का नया मकसद दिया है।”
— सगनूराम आंचला (आत्मसमर्पित)
इसी तरह बीरसिंह मंडावी ने बताया कि चौगेल कैंप उनके लिए एक पुनर्जन्म की तरह है, जहाँ उन्हें मुफ्त प्रशिक्षण देकर हुनरमंद बनाया गया।
कांकेर प्रशासन की नई मिसाल
छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति का असर अब धरातल पर दिखने लगा है। जिला प्रशासन की इस कवायद ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि सही मार्गदर्शन और अवसर मिले, तो हिंसा का रास्ता छोड़ चुके लोग भी समाज के निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं। कांकेर का यह मॉडल अब पूरे बस्तर संभाग के लिए एक प्रेरणा बन गया है।
















