छत्तीसगढ़ का नया ‘हॉर्टिकल्चर हब’: पारंपरिक खेती छोड़ नकदी फसलों से तकदीर बदल रहे जशपुर के किसान

जशपुर। अपनी खास भौगोलिक स्थिति और बेहतरीन आबोहवा के लिए मशहूर जशपुर जिला इन दिनों खेती-किसानी के मामले में एक बड़े बदलाव का गवाह बन रहा है। यहाँ के किसान अब धान जैसी पारंपरिक फसलों के दायरे से बाहर निकलकर बागवानी (हॉर्टिकल्चर) और मुनाफे वाली नकदी फसलों को अपना रहे हैं। राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की मंशा के अनुरूप स्थानीय प्रशासन, नाबार्ड और उद्यानिकी विभाग मिलकर किसानों को इस दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं। किसानों को आधुनिक तकनीक और सही ट्रेनिंग मिलने का ही नतीजा है कि पिछले दो-तीन वर्षों में यहाँ खेती की पूरी तस्वीर बदल गई है। आज जशपुर का किसान चाय और लीची के साथ-साथ स्ट्रॉबेरी, नाशपाती और सेब जैसी ठंडी जलवायु वाली फसलों की सफल खेती कर रहा है।
रूरल एजुकेशन एंड डेवलपमेंट सोसाइटी जैसी संस्थाओं और सरकारी विभागों के आपसी तालमेल से जशपुर ने फल उत्पादन के क्षेत्र में एक नई पहचान बनाई है। इस बदलाव ने न सिर्फ ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति को सुधारा है, बल्कि पूरे क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था को भी एक नई मजबूती दी है।
जशपुर का सेब: कश्मीर और हिमाचल को टक्कर
जशपुर में सेब उगाने का सिलसिला साल 2023 में शुरू हुआ था। देखते ही देखते आज लगभग 410 एकड़ के रकबे में यहाँ सेब के बाग लहलहा रहे हैं और करीब 410 किसान इस मुहिम से सीधे जुड़े हैं। जिले के बगीचा और मनोरा विकासखंड समेत शैला, छतौरी, करदना और छिछली जैसी पंचायतों में इस साल सेब की शानदार पैदावार हुई है। फलों का आकार और उनकी क्वालिटी बेहतरीन रही है। स्थानीय किसानों का तो यहाँ तक मानना है कि जशपुर में पैदा होने वाले सेब स्वाद और गुणवत्ता के मामले में कश्मीर या हिमाचल प्रदेश के सेबों से ज़रा भी कम नहीं हैं। संस्था के अध्यक्ष राजेश गुप्ता के मुताबिक, योजना के तहत 410 किसानों को जोड़कर उन्हें एक-एक एकड़ में सेब लगाने के लिए प्रेरित किया गया, जिसके अब बेहद सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं।
नाशपाती से हो रही लाखों की कमाई
सेब के अलावा नाशपाती भी जशपुर के किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। जिले के सन्ना, पंडरापाठ, महुआ, सोनक्यारी और धवईपाई जैसे इलाकों में लगभग 3,500 एकड़ क्षेत्र में नाशपाती के बाग फैले हैं। इतनी ही संख्या में किसान इसकी खेती से मुनाफा कमा रहे हैं। यहाँ की नाशपाती की मांग इतनी ज्यादा है कि इसकी बकायदा पैकिंग करके दिल्ली, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे बड़े राज्यों की मंडियों में भेजा जाता है। आंकड़ों की मानें तो जिले में सालाना लगभग 1,75,000 क्विंटल नाशपाती का उत्पादन हो रहा है, जिससे किसानों को प्रति एकड़ एक से डेढ़ लाख रुपये तक की शानदार सालाना आमदनी हो रही है।
राष्ट्रीय बागवानी मिशन से मिला संबल
उद्यानिकी विभाग के अफसरों का कहना है कि ‘राष्ट्रीय बागवानी मिशन’ इस पूरे बदलाव की रीढ़ बना हुआ है। इसके जरिए किसानों को न सिर्फ नई फसलों की ट्रेनिंग और तकनीकी सहायता दी जा रही है, बल्कि उन्हें सही मार्केट लिंकेज (बाजार पहुंच) भी उपलब्ध कराया जा रहा है। इसी का परिणाम है कि किसान आत्मनिर्भर बन रहे हैं।
जशपुर में चाय के बागान तो पहले से ही अपनी बेहतरीन क्वालिटी के लिए जाने जाते थे, लेकिन अब सेब और नाशपाती की इस नई कामयाबी ने जिले को फल बाजार के नक्शे पर चमका दिया है। इससे किसानों के रहन-सहन के स्तर में बड़ा सुधार आया है और आने वाले समय में प्रशासन इन नकदी फसलों का दायरा और बढ़ाने की तैयारी में है।
















