नेपाल चुनाव : अनुभवी ओली और युवा बालेन के बीच महामुकाबला, क्या बदलेगी सत्ता की तस्वीर?

काठमांडू (एजेंसी)। नेपाल में आज हो रहा मतदान केवल नई सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह देश की राजनीति में एक ऐतिहासिक ‘पीढ़ीगत बदलाव’ का संकेत दे रहा है। एक तरफ दशकों का अनुभव रखने वाले दिग्गज नेता केपी शर्मा ओली हैं, तो दूसरी तरफ ‘जेन जी’ (Gen Z) और युवाओं की आवाज बनकर उभरे बालेन्द्र शाह (बालेन)।
झापा-5: परंपरा और आधुनिकता की सीधी जंग
नेपाल की राजनीति का सबसे दिलचस्प मुकाबला झापा-5 सीट पर देखने को मिल रहा है। यह क्षेत्र लंबे समय से पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का अभेद्य किला रहा है। हालांकि, इस बार समीकरण बदले हुए हैं। काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन ने किसी सुरक्षित सीट के बजाय सीधे ओली के गढ़ में उन्हें चुनौती देकर सबको चौंका दिया है। यह मुकाबला ‘अनुभव बनाम जोश’ की सीधी लड़ाई बन गया है।
केपी शर्मा ओली: संघर्ष से सत्ता के शिखर तक
1952 में जन्मे ओली का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है।
जेल और विद्रोह: 1970 के दशक में राजशाही के खिलाफ ‘झापा विद्रोह’ में शामिल होने के कारण उन्होंने 14 साल जेल में बिताए।
राष्ट्रवाद का चेहरा: 2015 में भारत के साथ सीमा विवाद और ‘नाकेबंदी’ के दौरान ओली ने प्रखर राष्ट्रवादी रुख अपनाया, जिसने उन्हें देश का सबसे ताकतवर नेता बना दिया।
विवाद और चुनौतियां: बहुमत के बावजूद, अपनी ही पार्टी में कलह और संसद भंग करने के फैसलों के कारण उन्हें संवैधानिक संकट और जन-आक्रोश का सामना करना पड़ा।
बालेन शाह: रैपर से ‘किंगमेकर’ बनने का सफर
बालेन का उदय नेपाल की आधुनिक राजनीति की सबसे अनोखी घटना है। एक स्ट्रक्चरल इंजीनियर और मशहूर रैपर से राजनेता बने बालेन युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं।
शिक्षा और करियर: भारत से इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री लेने वाले बालेन ने राजनीति में आने से पहले संगीत के जरिए भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था पर चोट की।
मेयर के रूप में छाप: 2022 में निर्दलीय मेयर बनकर उन्होंने काठमांडू की कार्यप्रणाली को पूरी तरह बदल दिया। कचरा प्रबंधन और पारदर्शिता के लिए उनके उठाए कदमों ने उन्हें राष्ट्रीय नायक बना दिया।
2026 का दांव: जनवरी 2026 में मेयर पद छोड़कर उन्होंने रबि लामिछाने की ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ (RSP) के साथ गठबंधन किया और अब वे प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं।
क्या कहता है जनता का मूड?
पिछले साल सितंबर में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि नेपाल का युवा वर्ग अब पुरानी राजनीतिक शैली से ऊब चुका है। केपी शर्मा ओली को भारी दबाव के बीच इस्तीफा देना पड़ा था, लेकिन वे एक बार फिर चुनावी मैदान में अपनी साख बचाने उतरे हैं।
निष्कर्ष: आज की वोटिंग यह तय करेगी कि क्या नेपाल की जनता अभी भी पुराने दिग्गजों के ‘राष्ट्रवाद’ पर भरोसा करती है, या वह बालेन जैसे ‘जेन जी’ नेताओं के साथ एक नए डिजिटल और पारदर्शी युग की शुरुआत करना चाहती है।
















