छत्तीसगढ़

खनन प्रभावित वन भूमि के पुनरुद्धार में वैज्ञानिक वानिकी को सर्वोच्च प्राथमिकता : वन मंत्री केदार कश्यप

रायपुर। खनिज संसाधनों के उपयोग के बाद वन भूमि को उसकी प्राकृतिक पहचान लौटाना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। खनन समाप्त होने के बाद केवल पौधे लगा देना ही वन भूमि का पुनरुद्धार नहीं है, बल्कि उसे वैज्ञानिक तरीके से पुनर्स्थापित कर पुनः एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में विकसित करना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से छत्तीसगढ़ शासन के वन व जलवायु परिवर्तन, परिवहन, सहकारिता एवं संसदीय कार्य मंत्री श्री केदार कश्यप ने आज अपने कोरबा प्रवास के दौरान एनटीपीसी के प्रशासनिक भवन में सार्वजनिक एवं निजी उपक्रमों के प्रतिनिधियों तथा वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की समीक्षा बैठक ली।

बैठक में वन संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम के प्रावधानों और स्वीकृत शर्तों के अनुरूप खनन एवं परियोजनाओं से प्रभावित वन भूमि के पुनरुद्धार के सम्बंध में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए। इस अवसर पर विधायक कटघोरा श्री प्रेमचंद पटेल, प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख श्री अरुण कुमार पांडे, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (लैंड मैनेजमेंट) श्री सुनील मिश्रा, पावर ग्रिड कॉरपोरेशन, हिंडालको, एसईसीएल, एनटीपीसी, बालको, अडानी सहित प्रमुख सार्वजनिक व निजी औद्योगिक एवं खनन उपक्रमों के वरिष्ठ अधिकारी तथा वन विभाग के उच्चाधिकारी उपस्थित रहे।

वन मंत्री श्री केदार कश्यप ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चलना चाहिए। विकास के लिए संसाधनों का उपयोग आवश्यक है, लेकिन इसके साथ प्रकृति को हुई क्षति की भरपाई और वन भूमि को पुनः स्वस्थ स्वरूप प्रदान करना भी उतनी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने प्रधान मुख्य वन संरक्षक द्वारा जारी तकनीकी एवं व्यावहारिक दिशा-निर्देशों को सभी संबंधित कंपनियों एवं अधिकारियों को इनका शत-प्रतिशत पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

श्री कश्यप ने कहा कि वन भूमि केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि जैव विविधता, वन्यजीवों, जल स्रोतों और स्थानीय समुदायों के जीवन से जुड़ा महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। इसलिए खनन एवं औद्योगिक गतिविधियों के बाद इसके पुनरुद्धार में दीर्घकालिक पर्यावरणीय दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। वन मंत्री ने सभी औद्योगिक एवं खनन कंपनियों को अपने कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी मद का प्रभावी और संवेदनशील उपयोग करने के भी निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि खनन प्रभावित क्षेत्रों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों एवं स्थानीय समुदायों के आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक उन्नयन के लिए सीएसआर गतिविधियों को प्राथमिकता दी जाए। स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में ठोस और सकारात्मक बदलाव लाने वाले कार्यों को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि विकास का लाभ प्रभावित क्षेत्रों के समुदायों तक भी प्रभावी रूप से पहुंचे।

बैठक में स्पष्ट किया गया कि वन भूमि के उपयोग के बाद उसका पुनरुद्धार किसी औपचारिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहना चाहिए। रेस्टोरेशन एवं रिक्लेमेशन के प्रत्येक कार्य में वैज्ञानिक वानिकी सिद्धांतों, स्थानीय पारिस्थितिकी और स्थल की प्राकृतिक विशेषताओं को केंद्र में रखा जाए। संबंधित कंपनियों को निर्देशित किया गया कि खनन प्रभावित क्षेत्रों में केवल तेजी से बढ़ने वाली प्रजातियों का एकरूप पौधरोपण करने के बजाय स्थानीय एवं देशज प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाए। प्रजातियों का चयन क्षेत्र की जलवायु, मृदा, स्थल-गुण, जल उपलब्धता और स्थानीय वन संरचना के अनुरूप किया जाए, जिससे लगाए गए पौधे दीर्घकाल में स्थायी वन के रूप में विकसित हो सकें और प्राकृतिक पुनरुत्पादन को भी बढ़ावा मिले।

प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख श्री पांडे ने निर्देशित किया कि वैज्ञानिक पुनरुद्धार का दायरा केवल ओवरबर्डन डंप तक सीमित न रखा जाए। खनन के दौरान खोदे गए एवं प्रभावित संपूर्ण क्षेत्र में भूमि सुधार, मृदा संरक्षण और पौधरोपण का कार्य वैज्ञानिक सिल्वीकल्चरल तकनीकों के अनुसार किया जाए। उन्होंने मृदा की स्थिरता बनाए रखने, भू-क्षरण रोकने तथा खनन के बाद भूमि को पुनः वन विकास के लिए सक्षम बनाने के लिए स्थल-विशिष्ट तकनीकों के उपयोग पर विशेष जोर दिया।

बैठक में छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम की रोपण योजनाओं की भी समीक्षा की गई। निगम को निर्देशित किया गया कि वह केवल फास्ट-ग्रोइंग प्रजातियों पर निर्भर रहने के बजाय क्षेत्र की पारिस्थितिकीय आवश्यकताओं के अनुरूप स्थानीय एवं देशज प्रजातियों को प्राथमिकता दे। वन विकास का उद्देश्य केवल पौधों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि स्वस्थ, विविधतापूर्ण और दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ वन तैयार करना होना चाहिए।

वन एवं वन्यजीव संरक्षण को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ विषय बताते हुए बैठक में वन्यजीवों के आवास और उनके संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया गया। खनन प्रभावित क्षेत्रों में वन्यजीवों के आवास संरक्षण, सुरक्षित आवागमन तथा प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियां विकसित करने के निर्देश दिए गए। अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने कहा गया कि पुनरुद्धार की योजनाएं क्षेत्र की जैव विविधता और स्थानीय वन्यजीवों की आवश्यकताओं के अनुरूप हों।

वन विभाग के मैदानी अमले को भी रेस्टोरेशन कार्यों की निगरानी के लिए जवाबदेह बनाया गया। संबंधित वन मंडलाधिकारी एवं उनके अधीनस्थ अधिकारियों को नियमित क्षेत्र भ्रमण कर कार्यों की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करने तथा इसकी जानकारी विभागीय अभिलेखों में दर्ज करने के निर्देश दिए गए। पुनरुद्धार कार्यों की गुणवत्ता, पौधों की उत्तरजीविता, भूमि की स्थिति और निर्धारित वैज्ञानिक मानकों के पालन की नियमित समीक्षा सुनिश्चित करने कहा गया।

बैठक में वन विभाग के अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि खनन के बाद वन भूमि की बहाली केवल कागजी अनुपालन नहीं, बल्कि धरातल पर दिखाई देने वाला वैज्ञानिक और गुणवत्तापूर्ण परिणाम होना चाहिए। स्थानीय प्रजातियों की स्थापना, मृदा संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन, वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय समुदायों के हितों को साथ लेकर चलने वाली समग्र रेस्टोरेशन व्यवस्था के माध्यम से खनन प्रभावित क्षेत्रों को पुनः स्वस्थ एवं टिकाऊ पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में विकसित करने पर विशेष जोर दिया गया।

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