एकीकृत कृषि से सशक्त होती कांकेर की महिलाएं : “दीदी के बखरी” योजना लिख रही सफलता की नई इबारत

रायपुर। छत्तीसगढ़ के उत्तर बस्तर कांकेर जिले में ग्रामीण अर्थव्यवस्था एक बड़े बदलाव की गवाह बन रही है। यहाँ ‘बिहान’ योजना के अंतर्गत शुरू की गई “दीदी के बखरी” पहल ने महिलाओं को न केवल आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि उनके परिवारों के स्वास्थ्य और पोषण स्तर में भी सुधार किया है। सब्जी बाड़ी, मुर्गी पालन, मछली पालन और वनोपज संग्रहण जैसी गतिविधियों को एक साथ जोड़कर महिला किसान अपनी आय में रिकॉर्ड वृद्धि कर रही हैं।
एकीकृत कृषि: आय बढ़ाने का आधुनिक मॉडल
कांकेर जिले के चार प्रमुख विकासखंडों—नरहरपुर, कांकेर, भानुप्रतापपुर और चारामा—में इस योजना को प्रभावी ढंग से लागू किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य महिला किसानों की औसत मासिक आय को 20,000 से 25,000 रुपये तक पहुँचाना है।
वर्तमान में, इस पहल से कुल 3,364 महिलाएं जुड़ी हुई हैं, जिनका विवरण इस प्रकार है:
विकासखंड,सक्रिय महिला किसानों की संख्या
नरहरपुर,”1,200″
कांकेर,790
चारामा,734
भानुप्रतापपुर,640
भविष्य का लक्ष्य और आजीविका सेवा केंद्र
जिला पंचायत प्रशासन के मार्गदर्शन में इस अभियान को और विस्तार देने की तैयारी है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 10,780 नई महिलाओं को इस योजना से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।
महिलाओं की सहायता के लिए क्लस्टर स्तर पर ‘आजीविका सेवा केंद्र’ स्थापित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों का संचालन स्वयं महिलाओं द्वारा किया जाएगा, जहाँ से उन्हें उन्नत बीज, जैविक खाद और आधुनिक कृषि उपकरण आसानी से प्राप्त हो सकेंगे।
जमीनी स्तर पर सफलता की कहानियाँ
जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) ने हाल ही में विभिन्न गांवों का दौरा कर महिला उद्यमियों के कार्यों की समीक्षा की और उनका उत्साहवर्धन किया:
पोषण और स्वास्थ्य: ग्राम रावस की सुरेखा नेताम ने अपनी बाड़ी में ग्राफ्टेड सब्जियां और मुर्गी पालन को अपनाया है। उनका मानना है कि ताजी हरी सब्जियां और प्रोटीन युक्त आहार से एनीमिया जैसी समस्याओं से लड़ने में मदद मिलती है।
वनोपज का प्रबंधन: ग्राम ठेमा की नामिका यादव ने वनोपज संग्रहण और मछली पालन को आय का जरिया बनाया है। इमली, महुआ और शहद जैसे उत्पादों का सही विपणन ग्रामीण समुदायों की आर्थिक स्थिति बदल रहा है।
लागत में कमी और स्मार्ट फार्मिंग: ग्राम हाटकर्रा की मोतिन दर्रो ने ‘मुर्गी-सह-मछली पालन’ (Poultry-cum-Fish) का सफल उदाहरण पेश किया है। इसमें मुर्गियों के अवशेष मछली के चारे के रूप में उपयोग होते हैं, जिससे लागत घटती है और मुनाफ़ा बढ़ता है।
विविध गतिविधियां: ग्राम धनेली की जमुना कोर्राम और कठोली की अन्य महिलाएं डबरी निर्माण और सूरजमुखी की खेती जैसे नवाचारों से अपनी आजीविका को सुदृढ़ कर रही हैं।
निष्कर्ष: “दीदी के बखरी” केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के आत्मविश्वास और आर्थिक स्वावलंबन का प्रतीक बन गई है। एकीकृत कृषि के इस मॉडल ने साबित कर दिया है कि यदि सही संसाधन और मार्गदर्शन मिले, तो ग्रामीण महिलाएं विकास की मुख्य धारा का नेतृत्व कर सकती हैं।
















