ममता और संघर्ष की जीत : पानीहाटी से विधानसभा तक रत्ना देवनाथ का सफर

पश्चिम बंगाल (एजेंसी)। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में कई अप्रत्याशित बदलाव किए हैं। इन परिणामों के बीच एक चेहरा जो सबसे अधिक चर्चा में है, वह है रत्ना देवनाथ का। एक डॉक्टर बेटी को खोने के गहरे दुख को उन्होंने अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदल लिया और देखते ही देखते वे एक साधारण गृहिणी से विधायक बन गईं।
चुनावी जीत और कड़ा मुकाबला
दक्षिण 24 परगना की पानीहाटी सीट पर रत्ना देवनाथ ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के तीर्थंकर घोष को 28,000 से भी अधिक मतों के भारी अंतर से हराकर शानदार जीत दर्ज की। राजनीति में आने से पहले उनका इस क्षेत्र से कोई सीधा संबंध नहीं था, लेकिन उनकी जीत के आंकड़े बताते हैं कि जनता ने उनके संघर्ष को पूरी तरह स्वीकार किया है।
निजी त्रासदी बनी सियासी प्रेरणा
रत्ना देवनाथ की राजनीति में एंट्री एक बेहद दुखद घटना के बाद हुई। 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुई भयावह घटना ने न केवल बंगाल को हिलाकर रख दिया था, बल्कि रत्ना देवनाथ के लिए यह उनके जीवन का सबसे बड़ा दुख था। अपनी बेटी को खोने के बाद उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा और न्याय के लिए जो आंदोलन खड़ा किया, उसी ने उन्हें राजनीति के मंच पर लाकर खड़ा कर दिया। भाजपा ने उनके जज्बे को पहचानते हुए उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया।
कौन हैं रत्ना देवनाथ?
54 वर्षीय रत्ना देवनाथ एक मध्यमवर्गीय परिवार से आती हैं। उनके पति का नाम रंजन देवनाथ है। चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामे के मुताबिक, उनके पास लगभग 74 लाख रुपये की संपत्ति है। उनके चुनावी अभियान को भाजपा ने बहुत महत्व दिया था। नामांकन के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी उनके साथ मौजूद थीं, वहीं 24 अप्रैल को पानीहाटी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद उनके समर्थन में चुनावी जनसभा को संबोधित किया था।
बंगाल में बदलता सियासी समीकरण
इस बार के चुनावों में पश्चिम बंगाल में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला। भाजपा ने 207 सीटें जीतकर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया है, वहीं तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई है। रत्ना देवनाथ की जीत केवल एक विधानसभा सीट की जीत नहीं है, बल्कि इसे राज्य में महिलाओं की सुरक्षा और न्याय की मांग को लेकर खड़े हुए उस बड़े जन-आंदोलन की जीत के रूप में देखा जा रहा है।
















