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ममता बनर्जी के गढ़ में शुभेंदु की दहाड़ : कैसे अमित शाह की रणनीति ने पलटा बंगाल का खेल

पश्चिम बंगाल (एजेंसी)। पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों ने राज्य की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर सीट पर तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी को करारी शिकस्त देकर 2021 की यादें ताजा कर दीं। इस जीत के साथ ही अधिकारी ने नंदीग्राम में भी अपना परचम लहराया है। हालांकि, इस दोहरी जीत के पीछे की कहानी बेहद दिलचस्प है।

अमित शाह का वह ‘मास्टर प्लान’

सूत्रों के अनुसार, शुभेंदु अधिकारी खुद सिर्फ एक सीट यानी नंदीग्राम से चुनाव लड़ने के इच्छुक थे। लेकिन इस पूरी चुनावी बिसात को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अलग तरीके से सजाया था। भवानीपुर को ममता बनर्जी का अभेद्य किला माना जाता था, जिसे भेदने के लिए शाह ने एक विशेष रणनीति तैयार की थी।

बीते 2 अप्रैल को भवानीपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए शाह ने शुभेंदु को दो सीटों पर लड़ने के लिए प्रेरित किया था। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि शुभेंदु सिर्फ नंदीग्राम से नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के घर में घुसकर उन्हें हराना चाहते हैं और उन्हें ऐसा ही करना होगा। मतगणना के दौरान भी गृह मंत्री लगातार शुभेंदु के संपर्क में थे और पल-पल की जानकारी ले रहे थे।

भवानीपुर की कांटे की टक्कर

भवानीपुर में मुकाबला बेहद रोमांचक रहा। एक समय ऐसा था जब ममता बनर्जी लगभग 17,000 वोटों से आगे चल रही थीं और ऐसा लग रहा था कि वे इस सीट को सुरक्षित निकाल लेंगी। हालांकि, जैसे-जैसे वोटों की गिनती आगे बढ़ी, समीकरण बदलने लगे। शुभेंदु अधिकारी ने धीरे-धीरे फासला कम किया और अंततः 20 राउंड की गिनती के बाद ममता बनर्जी को 15,000 से अधिक वोटों से हरा दिया।

आंकड़ों के अनुसार, शुभेंदु अधिकारी को 73,917 वोट मिले, जबकि ममता बनर्जी 58,812 वोटों पर सिमट गईं। इस सीट पर कांग्रेस और वामपंथी दल काफी पीछे रहे।

नंदीग्राम में दबदबा और राजनीतिक भविष्य

भवानीपुर की तरह ही नंदीग्राम में भी शुभेंदु का प्रदर्शन शानदार रहा। यहाँ उन्होंने अपने पूर्व सहयोगी और टीएमसी उम्मीदवार पवित्र कर को 9,000 से अधिक मतों के अंतर से पराजित किया। नंदीग्राम में उन्हें कुल 1,27,301 वोट प्राप्त हुए।

जीत के बाद शुभेंदु अधिकारी ने इसे एक निर्णायक राजनीतिक क्षण करार दिया है। उन्होंने अपने बयान में इसे ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर के अंत का संकेत बताते हुए कहा कि यह केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि ‘हिंदुत्व’ की जीत है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि टीएमसी विरोधी वोट बैंक को एकजुट करने में उन्हें अन्य दलों के मतदाताओं का भी साथ मिला है, जिसने इस जीत को और भी प्रभावशाली बना दिया।

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