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जलवायु परिवर्तन का दोहरा खतरा : 2090 तक भीषण गर्मी और सूखे से जूझेंगे दुनिया के 260 करोड़ लोग

नई दिल्ली (एजेंसी)। वैज्ञानिकों द्वारा हाल ही में किए गए एक शोध ने वैश्विक जलवायु स्थिति को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। ‘जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स’ में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, यदि वर्तमान जलवायु नीतियों में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले कुछ दशकों में पृथ्वी एक ऐसे संकट की ओर बढ़ेगी, जहां गर्मी और सूखा मिलकर एक विनाशकारी स्थिति पैदा करेंगे।

संकट का भयावह स्वरूप

अध्ययन के चौंकाने वाले आंकड़ों के मुताबिक, यदि सब कुछ इसी तरह चलता रहा, तो सदी के अंत तक (वर्ष 2090 तक) दुनिया की लगभग 28% आबादी, यानी करीब 260 करोड़ लोग भीषण गर्मी और सूखे की दोहरी मार झेलने पर मजबूर होंगे। इसका प्रभाव वर्तमान समय की तुलना में पांच गुना अधिक हो सकता है।

शोध में बताया गया है कि 2001 से 2020 के दौरान प्रतिवर्ष औसतन चार बार ऐसी स्थितियां बनीं, जब गर्मी और सूखा एक साथ देखे गए। 1850-1900 के औद्योगिक काल के मुकाबले यह आवृत्ति पहले ही दोगुनी हो चुकी है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2090 तक ऐसी घटनाओं की आवृत्ति साल में 10 बार तक हो सकती है, और हर एक घटना लगभग दो सप्ताह तक प्रभावी रह सकती है।

क्या है ‘कंपाउंड एक्सट्रीम’ (Compound Extreme)?

वैज्ञानिकों ने इस स्थिति को ‘कंपाउंड एक्सट्रीम’ नाम दिया है। यह तब होता है जब एक से अधिक चरम मौसम संबंधी घटनाएं एक साथ घटित होकर प्रभावों को कई गुना बढ़ा देती हैं। इसके परिणाम स्वरूप:

खाद्य सुरक्षा: फसलें तेजी से नष्ट होती हैं, जिससे वैश्विक खाद्य कीमतों में भारी उछाल आता है।

जल संकट: जल स्रोतों का स्तर तेजी से गिरता है।

स्वास्थ्य जोखिम: लू (Heatwave) के कारण मृत्यु दर में वृद्धि होती है।

पारिस्थितिक तंत्र: जंगलों में आग लगने (Wildfire) की घटनाएं बढ़ जाती हैं, जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं।

श्रमिकों पर प्रभाव: जो लोग खुले वातावरण में काम करते हैं, उनके लिए यह स्थिति जानलेवा साबित हो सकती है।

समाधान की दिशा: पेरिस समझौता

शोधकर्ताओं का मानना है कि इस आपदा को टाला जा सकता है। यदि विभिन्न देश ‘पेरिस समझौते’ के तहत निर्धारित अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरी ईमानदारी और प्रभावी ढंग से लागू करें, तो इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। भविष्य में अरबों लोगों का जीवन सुरक्षित होगा या संकट में, यह आने वाले वर्षों में ली जाने वाली नीतिगत निर्णयों पर निर्भर करेगा।

शोध का वैज्ञानिक आधार

यह गंभीर निष्कर्ष काल्पनिक नहीं, बल्कि साक्ष्यों पर आधारित है। अध्ययन के दौरान 8 प्रमुख जलवायु मॉडलों के आधार पर 152 सिमुलेशन का बारीकी से विश्लेषण किया गया। इसमें भविष्य में होने वाली जनसंख्या वृद्धि और ग्लोबल वार्मिंग के विभिन्न संभावित परिदृश्यों को शामिल किया गया है। यह पूरा अध्ययन संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘आईपीसीसी’ (IPCC) की छठी आकलन रिपोर्ट के मानकों के अनुरूप है, जिसमें 1961 से 1990 की अवधि को आधार वर्ष (Base Period) माना गया है।

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