CBSE OSM विवाद : परीक्षा मूल्यांकन प्रणाली पर सियासी संग्राम, शिक्षा मंत्रालय से जवाबदेही की मांग

नई दिल्ली (एजेंसी)। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की कक्षा 12वीं की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली इन दिनों बड़े विवादों के घेरे में है। परीक्षा मूल्यांकन की इस डिजिटल प्रक्रिया में सामने आईं कथित खामियों और छात्रों के बढ़ते विरोध ने अब एक बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया है। विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है और देश की शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की है। छात्रों के भविष्य से जुड़ा यह संवेदनशील मुद्दा अब देश के सियासी गलियारों में पूरी तरह गरमा चुका है।
क्यों उठ रहे हैं ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) पर सवाल?
डिजिटल इंडिया की तर्ज पर शुरू की गई ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली के तहत छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन करके कंप्यूटर स्क्रीन पर जांचा जाता है। इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य कॉपियों के मूल्यांकन को तेज और त्रुटिहीन बनाना था।
मुख्य समस्या: पिछले कुछ समय में कई छात्रों और अभिभावकों ने कॉपियों की चेकिंग में भारी गड़बड़ी और गलत अंक दिए जाने की शिकायतें दर्ज कराई हैं। इसके बाद से ही इस पूरी डिजिटल मूल्यांकन प्रक्रिया की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर उंगलियां उठने लगी हैं।
विपक्ष के तीखे हमले और राजनीतिक गतिरोध
इस पूरे मामले को लेकर विपक्षी दलों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार छात्रों की जायज शिकायतों को नजरअंदाज कर रही है और युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। नेताओं का कहना है कि:
शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की भारी कमी दिख रही है।
जब देश का युवा अपनी समस्याओं को लेकर आवाज उठाता है, तो उसकी बात सुनने के बजाय मामले को दबाने का प्रयास किया जाता है।
परीक्षा जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में इतनी बड़ी तकनीकी और प्रशासनिक लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
हक के लिए आवाज उठाती आज की नई पीढ़ी
इस विवाद ने समाज में युवाओं की भूमिका पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। जानकारों का मानना है कि आज की नई पीढ़ी अपने अधिकारों और करियर को लेकर बेहद सजग है।
युवा अब चुप बैठने के बजाय व्यवस्था की कमियों पर खुलकर सवाल उठा रहे हैं।
शिक्षा, परीक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों पर छात्रों का यह कड़ा रुख यह दिखाता है कि अब शिक्षा से जुड़े फैसलों का असर सीधे देश की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने पर पड़ता है।
शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की आवश्यकता
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद के बाद अब पूरे परीक्षा तंत्र की समीक्षा करने का समय आ गया है। प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर कॉपियों के अंतिम मूल्यांकन तक, एक ऐसी अभेद्य और विश्वसनीय व्यवस्था बनाने की जरूरत है जिसमें किसी भी तकनीकी या मानवीय चूक की गुंजाइश न हो। छात्रों के बीच खोए हुए भरोसे को वापस पाने के लिए पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना और जवाबदेही तय करना बेहद जरूरी हो गया है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस दिशा में क्या ठोस कदम उठाती है।
















