चंबल नदी के आंचल में गूंजी किलकारियां : घड़ियालों के कुनबे में शामिल हुए सैकड़ों नए मेहमान

मुरैना (एजेंसी)। मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सीमाओं को जोड़ने वाला राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य इस समय प्रकृति प्रेमियों के लिए उत्सव का केंद्र बना हुआ है। अभयारण्य के पालिघाट क्षेत्र में घड़ियालों के कुनबे में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हाल ही में यहाँ चार विभिन्न प्राकृतिक घोंसलों से लगभग 100 नवजात घड़ियाल सुरक्षित तरीके से अंडों से बाहर आ चुके हैं। संकटग्रस्त जीवों की श्रेणी में शामिल घड़ियालों के वंश संरक्षण की दिशा में इसे एक ऐतिहासिक और बड़ी सफलता माना जा रहा है।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम: चप्पे-चप्पे पर वन विभाग की नजर
नवजात जीवों को प्राकृतिक खतरों से बचाने के लिए रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान से सटे इस संवेदनशील क्षेत्र में विशेष सुरक्षा चक्र तैयार किया गया है। वन विभाग की विशेष टीमें दिन-रात नदी के तटीय इलाकों में गश्त कर रही हैं।
वन्यजीव अधिकारियों ने स्थानीय निवासियों और यहाँ आने वाले सैलानियों से बेहद संवेदनशील घोंसले वाले क्षेत्रों से दूर रहने का आग्रह किया है, ताकि इंसानी दखल के कारण इन बेजुबानों को कोई नुकसान न पहुंचे। अधिकारियों के अनुसार, जन्म के शुरुआती कुछ हफ्ते इन नवजातों के अस्तित्व के लिए सबसे नाजुक होते हैं, जरा सी लापरवाही भी बड़े नुकसान की वजह बन सकती है।
दो महीने का इंतजार और रेतीले किनारों पर नई जिंदगी की शुरुआत
वन विभाग द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, इस प्रजनन काल की शुरुआत अप्रैल महीने में हुई थी। तब घड़ियालों ने पालिघाट के रेतीले किनारों पर करीब 22 से 25 घोंसले बनाकर उनमें 500 से 600 के करीब अंडे दिए थे।
लगभग 60 दिनों के प्राकृतिक इनक्यूबेशन (अंडे सेने की अवधि) के बाद मई के अंतिम सप्ताह से इन अंडों के फूटने और बच्चों के बाहर आने का सिलसिला शुरू हुआ। जंगली जानवरों के हमलों को रोकने के लिए इन घोंसलों को तीन तरफ से सुरक्षित घेरे (फेंसिंग) में लिया गया है। आने वाले दिनों में बाकी बचे अंडों से भी बच्चों के निकलने की पूरी संभावना है।
₹27 लाख से संवरेगा घड़ियालों का भविष्य: बनेगा आधुनिक हैचरी केंद्र
संरक्षण के इन जमीनी प्रयासों को और अधिक वैज्ञानिक और तकनीकी मजबूती देने के लिए सरकार पालिघाट में 27.25 लाख रुपये के बजट से एक अत्याधुनिक ‘घड़ियाल पालन केंद्र’ (Gharial Rearing Centre) का निर्माण कर रही है। इस केंद्र के बनने से कृत्रिम और सुरक्षित माहौल में घड़ियालों के बच्चों को बड़ा किया जा सकेगा, जिससे उनकी जीवित रहने की दर (Survival Rate) में काफी सुधार होगा।
तीन राज्यों की अनूठी धरोहर: चंबल का अनूठा इकोसिस्टम
एक नजर अभयारण्य पर: लगभग 5,400 वर्ग किलोमीटर में फैला यह विस्तृत क्षेत्र न सिर्फ घड़ियालों (जिनकी संख्या यहाँ 130 से अधिक वयस्क हो चुकी है), बल्कि मगरमच्छों, दुर्लभ कछुओं, गंगा डॉल्फिन और सैकड़ों प्रवासी पक्षियों का सुरक्षित आशियाना है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की त्रिकोणीय चौकसी इस अभयारण्य को भारत के सबसे अनूठे जलीय पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक बनाती है।
















