बाग नदी के आंचल में संवरती जिंदगी : कबीरधाम के रामपुर शिवनी में आज भी जारी है नदी से सोना निकालने की अनूठी परंपरा

कबीरधाम। छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में आज के आधुनिक युग के बीच आजीविका का एक बेहद अनोखा और प्राचीन तरीका देखने को मिलता है। रेगांखार वन क्षेत्र से सटे रामपुर शिवनी गांव के लोग बाग नदी की बालू से सोने के बारीक कण निकालकर अपना गुजर-बसर कर रहे हैं। ग्रामीणों के लिए यह केवल कमाई का साधन ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक अहम परंपरा भी है।
मुश्किल दिनचर्या और पारंपरिक औजार: तड़के अंधेरे में ही ग्रामीण टोकरी, फावड़ा और लकड़ी की खास छननी (जिसे स्थानीय तौर पर ‘डोंगी’ कहा जाता है) लेकर नदी किनारे जमा हो जाते हैं। दिनभर रेत को पानी से धोकर और छानकर सोने के बेहद सूक्ष्म कणों को एकत्र किया जाता है।
पूर्वजों की देन: रामपुर शिवनी के स्थानीय लोगों के साथ-साथ मध्य प्रदेश के मंडई बोदा इलाके से आए कई परिवार भी इस काम में जुटे हैं। इनका मानना है कि यह हुनर उन्हें अपने बुजुर्गों से मिला है, जिसे वे आज भी निष्ठा से संभाल रहे हैं।
मेहनत और अनिश्चित कमाई: आमतौर पर मानसून में बाढ़ के बाद नदी में सोने की मात्रा बढ़ जाती है। हालांकि अभी बाढ़ का समय नहीं है, फिर भी लोग उम्मीद के साथ लगे हुए हैं। कभी दिनभर की कड़ी मशक्कत के बाद एक दिन की दिहाड़ी जितना सोना मिलता है, तो कभी दो दिन की मजदूरी के बराबर का आभूषण-कण मिल जाता है।
इस सोने को स्थानीय बाजारों में बेचकर ग्रामीण अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। समय बदलने के बावजूद कबीरधाम के इस वनांचल में परंपरा और आजीविका का यह अनूठा संगम आज भी पूरी शिद्दत के साथ जीवंत है।
















