छत्तीसगढ़

बस्तर का कायाकल्प : माओवाद के साए से निकलकर देश का सबसे समृद्ध आदिवासी क्षेत्र बनने की ओर अग्रसर

रायपुर। दशकों तक माओवाद का दंश झेलने वाला बस्तर अब विकास की एक नई इबारत लिख रहा है। केंद्र और राज्य सरकार के साझा प्रयासों से इस आदिवासी बहुल क्षेत्र को देश का सबसे खूबसूरत और विकसित संभाग बनाने का संकल्प लिया गया है। यह बात मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने राजधानी रायपुर में लेखक राजीव रंजन प्रसाद और रचना नायडू द्वारा लिखित पुस्तक ‘तेरा राज नहीं आएगा रे’ के विमोचन के दौरान कही।

इस गरिमामयी समारोह में विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा, साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. शशांक शर्मा और पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर सहित कई वरिष्ठ बुद्धिजीवी शामिल हुए।

माओवाद का अंत और नया नेतृत्व

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि माओवाद ने बस्तर को लगभग चालीस साल पीछे धकेल दिया था। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सुदृढ़ नेतृत्व में इस आंतरिक सुरक्षा चुनौती का मुस्तैदी से सामना किया गया है। अब बस्तर में सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ा है और आम जनता भी खुलकर लोकतंत्र के पक्ष में खड़ी हो रही है। इस वैचारिक और जमीनी लड़ाई में लेखकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का भी बड़ा योगदान रहा है।

क्यों जरूरी है इस इतिहास का दस्तावेजीकरण?

विमोचित पुस्तक की सराहना करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह किताब ऐसे समय में आई है जब माओवाद अपनी अंतिम सांसें ले रहा है। समय के साथ पुरानी कड़वी यादें धुंधली हो जाती हैं, इसलिए यह बेहद जरूरी है कि इस कठिन दौर और शांति के लिए किए गए संघर्ष को किताबों के रूप में सहेज कर रखा जाए। आने वाली पीढ़ियां जब इसे पढ़ेंगी, तो वे जान पाएंगी कि:

हिंसा कभी भी किसी समस्या का स्थायी हल नहीं हो सकती।

जनता का विश्वास केवल संवैधानिक मूल्यों और लोकतंत्र से ही जीता जा सकता है।

शांति की बहाली के लिए कितने जवानों और नागरिकों ने अपने प्राणों की आहुति दी है।

शोध के चौंकाने वाले आंकड़े

लेखकों ने बस्तर के जमीनी हालातों और आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों से सीधा संवाद कर इस पुस्तक को तैयार किया है। शोध में यह बात सामने आई कि संगठन में शामिल होने वाले लगभग 80% लोग या तो पूरी तरह अनपढ़ थे या सिर्फ पांचवीं तक पढ़े थे। माओवाद ने मासूम बच्चों के हाथों में कलम की जगह बंदूक थमाकर एक पूरी पीढ़ी को शिक्षा और समाज से दूर कर दिया।

‘बस्तर रोडमैप 2.0’: आर्थिक और सामाजिक सुधार का नया ढांचा
सरकार अब बस्तर के नवनिर्माण के लिए एक सुनियोजित रणनीति पर काम कर रही है। पहले जहां केवल सुरक्षा बलों के कैंप हुआ करते थे, अब वहां ‘सेवा डेरे’ बनाए जा रहे हैं जो रोजगार, कौशल विकास और सरकारी योजनाओं के केंद्र बनेंगे।

बस्तर की तरक्की के लिए उठाए जा रहे प्रमुख कदम निम्नलिखित हैं:

क्षेत्र, योजना और लक्ष्य

आर्थिक उन्नति,वर्तमान में 85% आबादी की मासिक आय 15 हजार से कम है। अगले 3 वर्षों में इसे दोगुना करने के लिए कृषि के साथ-साथ पशुपालन (गाय-भैंस वितरण) और सहकारिता को बढ़ावा दिया जा रहा है।
शिक्षा का उजाला,माओवाद के कारण बंद हो चुके 421 स्कूलों को फिर से शुरू किया गया है। अबूझमाड़ और जगरगुंडा में अत्याधुनिक ‘एducation City’ बनाई जा रही है।
स्वास्थ्य एवं कृषि,’स्वस्थ बस्तर अभियान’ के तहत लाखों लोगों का इलाज किया जा रहा है। इंद्रावती नदी पर देउरगांव और मटनार बैराज का निर्माण कर किसानों को सिंचाई की सुविधा दी जा रही है।

बस्तर की संस्कृति और पर्यटन को नई पहचान

उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कार्यक्रम में कहा कि माओवाद कोई आर्थिक मजबूरी नहीं, बल्कि एक थोपी गई हिंसक विचारधारा थी। आज बंदूकें शांत हो रही हैं और बस्तर के पारंपरिक मेलों, मड़इयों, साप्ताहिक बाजारों और देवगुड़ियों (पूजा स्थलों) में पुरानी रौनक लौट आई है। ‘बस्तर पंडुम’ और ‘बस्तर ओलंपिक’ जैसे आयोजनों के माध्यम से यहाँ की समृद्ध जनजातीय संस्कृति को वैश्विक मंच मिल रहा है।

विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने भी लेखकों को बधाई देते हुए कहा कि यह पुस्तक वातानुकूलित कमरों में बैठकर नहीं, बल्कि बस्तर के घने जंगलों की खाक छानकर और जमीनी हकीकत को समझकर लिखी गई एक प्रामाणिक कृति है।

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