छत्तीसगढ़ में मितानिनों का शक्ति प्रदर्शन : नियमितीकरण और सम्मानजनक मानदेय के लिए भरी हुंकार

रायपुर। छत्तीसगढ़ की ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में अहम् भूमिका निभाने वाली मितानिनों ने अब अपने अधिकारों के लिए प्रदेश सरकार के विरुद्ध आर-पार की जंग का ऐलान कर दिया है। ‘छत्तीसगढ़ मितानिन (आशा) यूनियन’ के बैनर तले प्रदेशभर की कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और स्वास्थ्य मंत्री को एक 17 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा है। मितानिनों का कहना है कि लंबे समय से उनकी मांगों को नजरअंदाज किया जा रहा है, जिससे उनमें भारी आक्रोश है।
प्रमुख मांगें और मुद्दे
मितानिनों ने अपनी दुर्दशा को उजागर करते हुए प्रशासन के सामने निम्नलिखित प्रमुख माँगें रखी हैं:
शासकीय कर्मचारी का दर्जा: यूनियन की प्राथमिक मांग है कि सभी मितानिनों को स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत सरकारी कर्मचारी घोषित किया जाए।
मानदेय में वृद्धि: वर्तमान में मिलने वाली 2,200 रुपये की सरकारी राशि को बढ़ाकर 10,000 रुपये करने की मांग की गई है।
निश्चित कार्य अवधि और साप्ताहिक अवकाश: मितानिनों का कहना है कि 24 घंटे काम के दबाव और रविवार को होने वाली बैठकों के कारण उनका निजी जीवन प्रभावित हो रहा है। उन्होंने आपातकालीन सेवाओं के अलावा रविवार को छुट्टी देने की मांग की है।
समय पर भुगतान: मानदेय को टुकड़ों में देने के बजाय हर महीने की 6 तारीख तक सीधे खाते में जमा करने का आग्रह किया गया है।
सामाजिक सुरक्षा: भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पीएफ (PF), पेंशन और ग्रेच्युटी की सुविधा देने की मांग भी उठाई गई है।
“कोरोना योद्धाओं” की अनदेखी का आरोप
यूनियन के प्रतिनिधियों ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि वैश्विक महामारी कोरोना के दौरान उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना ‘फ्रंटलाइन वॉरियर’ के रूप में काम किया। इसके बावजूद, आज उन्हें न्यूनतम मजदूरी के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। मितानिनों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार जल्द ही उनकी 17 सूत्रीय मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लेती है, तो वे आने वाले दिनों में और भी उग्र आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगी।
















