पश्चिम एशिया संकट : भारतीय विमानन क्षेत्र पर मँडराते आर्थिक बादल और महँगा होता हवाई सफर

नई दिल्ली (एजेंसी)। भारतीय विमानन उद्योग, जो पहले से ही भारत-पाकिस्तान सीमा तनाव, हालिया विमान दुर्घटनाओं और उड़ानों के रद्द होने जैसी चुनौतियों से जूझ रहा था, अब पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) के युद्ध की चपेट में है। ईरान और आसपास के क्षेत्रों में जारी संघर्ष ने भारतीय एयरलाइंस के वित्तीय गणित को बिगाड़ दिया है।
खाड़ी देशों पर टिकी है एयरलाइंस की किस्मत
भारतीय विमानन कंपनियों के लिए खाड़ी देश (बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और यूएई) रीढ़ की हड्डी के समान हैं। आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल अंतरराष्ट्रीय यात्री यातायात का लगभग 51% हिस्सा इन्हीं देशों से आता है। युद्ध के कारण इस रूट पर संकट आने का सीधा मतलब है भारतीय एयरलाइंस के राजस्व पर भारी चोट।
यात्रियों पर बढ़ा किराए का बोझ
हवाई यात्रियों को अब इस भू-राजनीतिक तनाव की कीमत अपनी जेब से चुकानी पड़ रही है। इंडिगो, एयर इंडिया और अकासा एयर जैसी प्रमुख कंपनियों ने पहले ही किरायों में 199 रुपये से लेकर 2,300 रुपये तक की वृद्धि कर दी है। इसके पीछे मुख्य कारण हैं:
लंबा रूट: पाकिस्तान का हवाई क्षेत्र बंद होने और पश्चिम एशिया में असुरक्षित रास्तों के कारण विमानों को घूमकर जाना पड़ रहा है।
ईंधन की खपत: लंबे रास्तों की वजह से ईंधन (ATF) का खर्च बढ़ गया है।
राजस्व का नुकसान: इक्रा (ICRA) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय विमानन उद्योग की कुल कमाई का 15-20% हिस्सा पश्चिम एशिया के परिचालन से आता है, जो अब खतरे में है।
अंतरराष्ट्रीय रूट: संघर्ष के साये में टॉप डेस्टिनेशन
डीजीसीए (DGCA) के हालिया आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत के टॉप-7 अंतरराष्ट्रीय मार्गों में से 5 सीधे तौर पर प्रभावित क्षेत्र में हैं। 14 से 28 मार्च के बीच के शेड्यूल को देखें तो:
गंतव्य (शहर), उड़ानों की संख्या
दुबई (यूएई),498
अबू धाबी (यूएई),256
सिंगापुर,193
बैंकॉक (थाईलैंड),190
शारजाह (यूएई),188
दोहा (कतर),187
जेद्दा (सऊदी अरब),174
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कुल अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का लगभग 40% हिस्सा युद्ध प्रभावित क्षेत्रों या उनके आसपास से गुजरता है। विशेष रूप से एयर इंडिया एक्सप्रेस, अकासा एयर और स्पाइसजेट की 90% उड़ानें इसी क्षेत्र पर निर्भर हैं।
बढ़ता घाटा: एक पुरानी चुनौती
भारतीय एयरलाइंस के लिए घाटे का सौदा कोई नई बात नहीं है, लेकिन ताजा संकट इसे और गहरा कर रहा है:
वित्त वर्ष 2025: प्रमुख एयरलाइंस को लगभग 4,600 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा।
अतीत का अनुभव: रूस-यूक्रेन युद्ध के समय ईंधन की कीमतों में उछाल और रुपये की गिरती कीमत के कारण यह घाटा 20,000 करोड़ रुपये तक पहुँच गया था।
मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए, यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम नहीं हुआ, तो भारतीय विमानन कंपनियों के लिए भविष्य की राह और भी कठिन हो सकती है।
















