कंगाली की कगार पर पाकिस्तान : UAE ने वापस मांगा कर्ज, अब सऊदी अरब से ही आस

इस्लामाबाद (एजेंसी)। पहले से ही गंभीर आर्थिक तंगहाली से जूझ रहे पाकिस्तान की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) द्वारा अपने अरबों डॉलर के बकाया कर्ज की वापसी की मांग ने शहबाज शरीफ सरकार की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ऐसे नाज़ुक वक्त में अब पाकिस्तान एक बार फिर सऊदी अरब की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है।
सऊदी अरब बनेगा ‘संकटमोचक’?
पाकिस्तान के डगमगाते विदेशी मुद्रा भंडार को संभालने के लिए सऊदी अरब के वित्त मंत्री मोहम्मद अल-जदान का आगामी इस्लामाबाद दौरा बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि सऊदी अरब पाकिस्तान को इस वित्तीय भंवर से निकालने के लिए कोई बड़ी राहत दे सकता है। खुद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी स्वीकार किया है कि देश की आर्थिक स्थिरता को बनाए रखने में सऊदी अरब का सहयोग हमेशा ढाल की तरह रहा है।
UAE को भुगतान: खाली हो जाएगा खजाना
पाकिस्तान को साल 2018 में UAE से लिए गए 3 अरब डॉलर के कर्ज का भुगतान करना है।
दबाव का कारण: यह राशि पाकिस्तान के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 18% है।
खतरे की घंटी: स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के आंकड़ों के अनुसार, मार्च के अंत तक देश के पास 16.4 अरब डॉलर का रिजर्व था। इतने बड़े भुगतान के बाद आयात और अन्य खर्चों के लिए पाकिस्तान के पास बहुत कम गुंजाइश बचेगी।
बदल रहे हैं खाड़ी देशों के समीकरण?
जानकारों का मानना है कि UAE द्वारा कर्ज की अवधि बढ़ाने (Roll-over) से मना करना केवल एक वित्तीय फैसला नहीं है। पश्चिम एशिया में ईरान और अन्य देशों के बीच बढ़ते तनाव और बदलते कूटनीतिक रिश्तों का असर भी पाकिस्तान पर पड़ता दिख रहा है। हालांकि, आधिकारिक तौर पर इसे एक सामान्य प्रक्रिया ही बताया जा रहा है।
रक्षा क्षेत्र में बढ़ती करीबी
आर्थिक तनाव के बीच सऊदी और पाकिस्तान के सैन्य संबंध मजबूत हो रहे हैं। पाकिस्तानी वायुसेना का एक दल हाल ही में सऊदी अरब के किंग अब्दुलअजीज एयर बेस पर तैनात किया गया है। यह कदम दोनों देशों के बीच बढ़ते सामरिक और रक्षा सहयोग को दर्शाता है।
IMF और अंतरराष्ट्रीय देनदारियां
पाकिस्तान के सामने इस वक्त दोहरी चुनौती है:
उसे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को 1.3 अरब डॉलर के बॉन्ड का भुगतान करना है।
दूसरी ओर, वह IMF से मिलने वाली 1.2 अरब डॉलर की अगली किश्त का बेसब्री से इंतजार कर रहा है।
निष्कर्ष: UAE के इस कड़े रुख ने पाकिस्तान की वित्तीय योजना को तहस-नहस कर दिया है। यदि सऊदी अरब से समय रहते बड़ी मदद नहीं मिली, तो पाकिस्तान के लिए विदेशी मुद्रा भंडार को बचा पाना और दिवालिया होने से बचना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।
















