छत्तीसगढ़

हौसलों को मिले पहिए : पुरोचन साहू की स्वावलंबन और आत्मसम्मान की नई उड़ान

रायपुर। सही समय पर मिली सरकारी मदद कैसे किसी व्यक्ति की जिंदगी और हौसले को बदल सकती है, इसका बेहतरीन उदाहरण मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले के पद्दा टोला गांव में देखने को मिला है। यहाँ के रहने वाले 35 वर्षीय पुरोचन साहू ने अपनी 75 फीसदी शारीरिक दिव्यांगता को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। वे हमेशा से अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए कड़ी मेहनत करते रहे, लेकिन सीमित मोबिलिटी (आवागमन) उनके काम के आड़े आ रही थी।

चुनौतियों भरा था सफर

पुरोचन मौसम के हिसाब से अपनी आजीविका चलाते हैं। वे गर्मियों में गाँव-गाँव घूमकर आइसक्रीम बेचते हैं और बाकी दिनों में ब्रेड की सप्लाई करते हैं। शारीरिक अक्षमता के कारण रोज़ाना कई किलोमीटर का सफर तय करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी। आवाजाही की इसी दिक्कत की वजह से वे अक्सर उन बाजारों या इलाकों में नहीं जा पाते थे, जहाँ उन्हें अपनी मेहनत का बेहतर दाम और ज्यादा ग्राहक मिल सकते थे।

‘सुशासन तिहार 2026’ से बदला जीवन

पुरोचन की यह परेशानी दूर हुई ‘सुशासन तिहार 2026’ के दौरान। जब समाज कल्याण विभाग को उनकी इस समस्या का पता चला, तो विभाग की ओर से उन्हें एक बैटरी चलित ट्राइसाइकिल (ई-ट्राइसाइकिल) प्रदान की गई। यह वाहन उनके लिए सिर्फ एक साधन नहीं, बल्कि उनकी आजादी और स्वाभिमान का जरिया बन गया है।

अब बिना किसी बाहरी मदद के पुरोचन दूर-दराज के गाँवों और हाट-बाजारों तक आसानी से पहुँच रहे हैं। इससे न केवल उनके व्यापार का दायरा बढ़ा है, बल्कि उनके मुनाफे में भी अच्छी बढ़ोतरी हुई है।

आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा

“पहले सफर करने में पूरा बदन थक जाता था और कई बार चाहकर भी मैं काम पर नहीं निकल पाता था। जब से यह बैटरी वाली ट्राइसाइकिल मिली है, मेरी जिंदगी का संघर्ष बहुत कम हो गया है। अब मैं पूरे भरोसे के साथ दूर के बाजारों में भी जाता हूँ और पहले से अधिक कमा लेता हूँ। सबसे ख़ुशी इस बात की है कि अब मुझे अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता।”
— पुरोचन साहू

आज पुरोचन की आँखों में भविष्य को लेकर एक नया भरोसा है। जो रास्ते पहले उनके लिए बेहद मुश्किल और थका देने वाले थे, अब वे उनकी तरक्की का रास्ता बन चुके हैं। प्रशासन की इस संवेदनशील पहल और समय पर मिली सहायता के प्रति आभार जताते हुए पुरोचन कहते हैं कि यह योजनाएं जमीन पर दिव्यांगजनों के जीवन को सच में बदल रही हैं।

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