आत्मसमर्पण से आत्मनिर्भरता तक : सरकारी योजनाओं ने संवारी सुकमा के मड़कम भीमा की जिंदगी

सुकमा। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में सरकार की पुनर्वास नीति और विकासपरक योजनाएं भटके हुए युवाओं को नई जिंदगी दे रही हैं। इसका एक बेहतरीन उदाहरण कोंटा विकासखंड के ग्राम पंचायत पोलमपल्ली के रहने वाले मड़कम भीमा हैं। भीमा ने कभी हिंसा का रास्ता चुना था, लेकिन अब वे बंदूक छोड़कर लोकतंत्र और विकास की मुख्यधारा का हिस्सा बन चुके हैं। जिला प्रशासन और सुरक्षा बलों के संयुक्त प्रयासों से वे आज समाज में पूरे सम्मान के साथ एक सामान्य जीवन जी रहे हैं।
पक्के मकान से मिली जीवन को स्थिरता
मुख्यधारा में कदम रखने के बाद प्रशासन ने मड़कम भीमा को शासकीय योजनाओं का लाभ दिलाना शुरू किया। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के अंतर्गत उन्हें पक्के घर के निर्माण के लिए वित्तीय मदद दी गई। इस योजना की बदौलत आज उनका परिवार एक सुरक्षित और पक्के मकान में रह रहा है, जिसने उनके जीवन को स्थायित्व और सुरक्षित भविष्य की उम्मीद दी है।
मनरेगा के जरिए आर्थिक रूप से हुए सशक्त
रोजगार और आजीविका के लिए भीमा को मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) से जोड़ा गया। उन्होंने गांव में होने वाले विकास कार्यों में श्रमदान किया और मेहनत की कमाई सीधे उनके बैंक खाते में पहुंची। इस रोजगार ने न केवल उनकी माली हालत सुधारी, बल्कि उनके भीतर एक नया आत्मविश्वास भी जगाया।
“हिंसा का रास्ता छोड़ विकास, शिक्षा और आत्मनिर्भरता की राह चुनकर जीवन की एक नई और बेहतर शुरुआत की जा सकती है।”
नई राह, नया जीवन
मड़कम भीमा आज अपने परिवार के साथ गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उनका मानना है कि शासन की जनहितैषी योजनाओं और प्रशासन के मार्गदर्शन ने उन्हें समाज में एक नई पहचान दी है। वे अब अपने परिवार के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में जुटे हैं।
भीमा की यह कहानी छत्तीसगढ़ के अन्य भटके हुए युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा है। यह साबित करती है कि अगर इरादा बदला जाए, तो सरकार की पुनर्वास नीतियां समाज की मुख्यधारा में लौटने वाले हर व्यक्ति को संबल देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
















