रूसी कच्चे तेल के आयात में भारत की ऐतिहासिक छलांग : मार्च में तीन गुना बढ़ी खरीदारी

नई दिल्ली (एजेंसी)। वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में आए हालिया उतार-चढ़ाव के बीच भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद में अब तक के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत एक बार फिर रूसी जीवाश्म ईंधन के दुनिया के दूसरे सबसे बड़े खरीदार के रूप में उभरा है। यह बदलाव अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक तेल कीमतों में आई तेजी और वाशिंगटन द्वारा दी गई एक महीने की विशेष छूट के बाद देखा गया है।
आयात में जबरदस्त वृद्धि: मुख्य आंकड़े
‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ (CREA) की ताजा रिपोर्ट भारत की रणनीति में आए बड़े बदलाव की पुष्टि करती है:
मूल्य में वृद्धि: मार्च में रूस से कच्चे तेल के आयात का कुल मूल्य बढ़कर 5.3 अरब यूरो हो गया, जो पिछले आंकड़ों की तुलना में तीन गुना से अधिक है।
कुल जीवाश्म ईंधन: भारत ने रूस से कुल 5.8 अरब यूरो का ईंधन मंगाया, जिसमें कच्चे तेल की हिस्सेदारी 91% रही। इसके अलावा कोयला और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों का भी आयात किया गया।
बाजार हिस्सेदारी: दिलचस्प बात यह है कि जहाँ भारत के कुल वैश्विक तेल आयात में 4% की मामूली गिरावट आई, वहीं अकेले रूसी तेल की आवक दोगुनी हो गई।
सरकारी रिफाइनरियों की सक्रिय वापसी
इस उछाल का एक प्रमुख कारण अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों में दी गई अस्थायी ढील है। ईरान संकट के कारण तेल की बढ़ती कीमतों को स्थिर करने के लिए अमेरिका ने पूर्व-मंजूर जहाजों को छूट दी थी। इसका सीधा लाभ भारत की सरकारी तेल कंपनियों को मिला:
भारी बढ़ोत्तरी: सरकारी रिफाइनरियों के आयात में महीने-दर-महीने 148% की वृद्धि दर्ज की गई।
रिफाइनरियों का पुनरुद्धार: मंगलौर और विशाखापत्तनम जैसी रिफाइनरियों ने, जिन्होंने नवंबर 2025 में रूसी तेल लेना बंद कर दिया था, मार्च में फिर से खरीदारी शुरू कर दी।
निजी बनाम सरकारी: निजी रिफाइनरियों के आयात में भी 66% की वृद्धि देखी गई, हालांकि यह पिछले वर्ष के मुकाबले अभी भी कम है।
वैश्विक समीकरण और रिफाइंड उत्पादों का खेल
रूस के लिए अब एशियाई बाजार जीवनरेखा बन चुके हैं। 2026 की पहली तिमाही में रूस के कुल तेल निर्यात का 90% हिस्सा चीन और भारत को गया। मार्च में रूस के कुल निर्यात का 51% चीन ने और 38% भारत ने खरीदा।
एक रोचक पहलू: भारतीय रिफाइनरियां रूस से सस्ता तेल खरीदकर उसे रिफाइन कर रही हैं और फिर उन्हीं पश्चिमी देशों (जैसे यूरोपीय संघ और अमेरिका) को बेच रही हैं जिन्होंने रूस पर प्रतिबंध लगा रखे हैं।
यूरोपीय संघ की बढ़ती चिंताएं
भारत की इस रिफाइनिंग रणनीति ने यूरोपीय देशों में हलचल पैदा कर दी है। मार्च में यूरोपीय बंदरगाहों पर ऐसे 14 शिपमेंट पहुंचे जिनमें रूसी तेल से बने उत्पाद होने का संदेह है। इनमें से चार बड़े शिपमेंट भारत से आए थे, जिनका मुख्य गंतव्य फ्रांस था।
CREA ने अब यूरोपीय एजेंसियों से इन आयातों की सख्त जांच की मांग की है। भविष्य में यह देखना चुनौतीपूर्ण होगा कि अमेरिकी छूट की अवधि समाप्त होने के बाद भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और कूटनीतिक दबाव के बीच कैसे संतुलन बनाता है।
















