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ओणम और सांस्कृतिक पहचान : परंपरा, आस्था और ‘सेक्युलर’ व्याख्या की बहस

केरल (एजेंसी)। केरल में ओणम का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। फूलों की पोक्कलम (रंगोली), नावों की दौड़ (वल्लमकली), और केले के पत्तों पर परोसा जाने वाला ओणम सद्य इस उत्सव की प्रमुख विशेषताएं हैं। विविधता भरे इस राज्य में विभिन्न समुदाय मिलकर इस पर्व की खुशियों में शामिल होते हैं। हालांकि, हर वर्ष इस त्योहार के आगमन के साथ ही सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर इसकी मूल पहचान को लेकर एक वैचारिक चर्चा छिड़ जाती है।

त्योहार की पहचान और विभिन्न दृष्टिकोण

अक्सर एक बहस यह उठती है कि क्या ओणम को केवल एक क्षेत्रीय या फसल कटाई (हार्वेस्ट) का त्योहार माना जाए या इसकी धार्मिक और पौराणिक जड़ों को भी उसी रूप में स्वीकार किया जाए। आलोचकों का तर्क है कि जहां ईद और क्रिसमस जैसे त्योहारों को उनके धार्मिक स्वरूप के साथ मनाया जाता है, वहीं ओणम जैसी सांस्कृतिक परंपराओं को कई बार धर्म-निरपेक्ष स्वरूप देने के प्रयास में इसकी पौराणिक मान्यताओं को गौण कर दिया जाता है।

पौराणिक कथा और ऐतिहासिक संदर्भ

हिंदू मान्यताओं और वामन एवं भागवत पुराण के अनुसार, ओणम का सीधा संबंध राजा महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा से है। यह माना जाता है कि थिरुवोणम नक्षत्र के दिन राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने आते हैं। इसी उपलक्ष्य में त्रिक्काकरा मंदिर में विशेष पूजन, ओणाथप्पन की स्थापना और दीप प्रज्ज्वलन जैसे धार्मिक अनुष्ठान सदियों से किए जाते रहे हैं।

आधुनिक व्याख्याएं और सामाजिक विमर्श

समय के साथ इस पौराणिक कथा की व्याख्याओं में भी बदलाव देखा गया है। कुछ विचारकों और राजनेताओं ने इसे सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आंचलिक संदर्भों से जोड़कर प्रस्तुत किया है। वहीं, दूसरी ओर समाज का एक वर्ग यह मानता है कि त्योहारों को केवल ‘संस्कृति’ या ‘फसल’ का नाम देकर उनकी प्राचीन धार्मिक जड़ों से अलग करना उनकी मौलिकता को प्रभावित करता है। इसी तरह की चर्चाएं पोंगल और बैसाखी जैसे अन्य क्षेत्रीय पर्वों के संदर्भ में भी देखने को मिलती हैं।

धार्मिक संगठनों और समुदायों का रुख

ओणम में विभिन्न समुदायों की भागीदारी को लेकर अलग-अलग विचार सामने आते रहे हैं:

इस्लामिक विद्वान: समय-समय पर कुछ धर्मशास्त्रियों ने यह राय दी है कि चुकि ओणम की जड़ें पौराणिक मान्यताओं से जुड़ी हैं, इसलिए इसमें धार्मिक तौर पर शामिल होने को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए।

ईसाई संस्थाएं: सिरो-मालाबार चर्च जैसे संगठनों ने अक्सर इसे केरल की एक साझा सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखा है, जिसे सामाजिक सौहार्द और भाईचारे के प्रतीक के तौर पर मनाया जा सकता है।

व्यापक स्तर पर, केरल के नागरिक इसे आपसी भाईचारे और खुशी के अवसर के रूप में मनाते हैं। हालांकि, वर्तमान बहस इस बात पर केंद्रित है कि सर्वधर्म समभाव और सौहार्द को बढ़ावा देते समय किसी भी पर्व की ऐतिहासिक एवं पौराणिक पहचान को सुरक्षित रखना भी उतना ही आवश्यक है।

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