छत्तीसगढ़

सिलाई मशीन की गूंज से ‘लखपति दीदी’ बनने तक का सफर : विशाखा मंडल की प्रेरणादायक कहानी

रायपुर। आर्थिक तंगहाली और सीमित संसाधनों के बीच जीने वाली महिलाएं अगर ठान लें, तो अपनी किस्मत खुद बदल सकती हैं। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के एक छोटे से गाँव, राधा कृष्ण नगर की रहने वाली श्रीमती विशाखा मंडल ने इस बात को सच कर दिखाया है। कभी घर की बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करने वाली विशाखा आज न सिर्फ आर्थिक रूप से मजबूत हैं, बल्कि ग्रामीण परिवेश की महिलाओं के लिए स्वावलंबन का एक चमकता हुआ चेहरा बन चुकी हैं।

ऐसे बदला जिंदगी का रुख

विशाखा का जीवन भी अन्य ग्रामीण महिलाओं की तरह घरेलू जिम्मेदारियों और आर्थिक चुनौतियों के बीच सिमटा हुआ था। कम आमदनी के कारण परिवार का भविष्य अनिश्चित नजर आता था। इसी बीच, उनकी जिंदगी में एक बड़ा बदलाव तब आया जब वे ‘राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन’ के तहत संचालित जाग्रति महिला स्व सहायता समूह से जुड़ीं।

छोटे से कर्ज से शुरू हुआ बड़ा कारोबार

समूह से जुड़ने के बाद विशाखा को अपने हुनर को तराशने का मौका मिला। उन्हें सामुदायिक निवेश कोष से 30,000 रुपये का लोन मिला। इस राशि का सही इस्तेमाल करते हुए उन्होंने:

एक अच्छी सिलाई मशीन खरीदी।

जरूरी कपड़े और सिलाई की सामग्री जुटाई।

सवनी मोड़ (महाराजगंज) में अपनी एक छोटी सी लेडीज टेलरिंग शॉप खोली।

संघर्ष से सफलता तक: शुरुआत में मुश्किलें आईं, लेकिन विशाखा की लगन, सिलाई के हुनर और ग्राहकों के प्रति उनके अच्छे व्यवहार ने जल्द ही उनकी दुकान को इलाके में मशहूर कर दिया।

कमाई में बढ़ोत्तरी और ‘लखपति दीदी’ का खिताब

पिछले ढाई साल की कड़ी मेहनत का नतीजा आज सबके सामने है। त्योहारों और शादियों के सीजन में उनकी दुकान पर पैर रखने की जगह नहीं होती।

त्योहारों पर कमाई: दीपावली और दशहरा जैसे बड़े उत्सवों के दौरान उनकी एक दिन की कमाई 3,000 रुपये तक पहुंच जाती है।

सालाना टर्नओवर: आज वे सालाना करीब 1.5 लाख रुपये कमा रही हैं, जिसके चलते उन्हें गर्व से ‘लखपति दीदी’ कहा जाने लगा है।

आत्मनिर्भरता से बढ़ा सम्मान

विशाखा बताती हैं कि स्व सहायता समूह ने उन्हें सिर्फ आर्थिक रूप से ही मजबूत नहीं किया, बल्कि समाज में सिर उठाकर जीने का हौसला भी दिया। जो विशाखा कभी दूसरों पर निर्भर थीं, आज वे अपने परिवार की आर्थिक रीढ़ बन चुकी हैं।

अब उनका मकसद सिर्फ खुद आगे बढ़ना नहीं है, बल्कि वे अपने गाँव की अन्य महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें आजीविका समूहों से जोड़ने के लिए लगातार प्रेरित कर रही हैं।

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