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हरिवंश नारायण सिंह फिर बने राज्यसभा के उपसभापति, सदन ने जताया भरोसा

नई दिल्ली (एजेंसी)। भारतीय संसदीय इतिहास में शुक्रवार को एक नया अध्याय जुड़ गया। हरिवंश नारायण सिंह एक बार फिर राज्यसभा के उपसभापति निर्वाचित हुए हैं। खास बात यह है कि वह सदन के पहले ऐसे मनोनीत सदस्य हैं, जिन्हें इस महत्वपूर्ण संवैधानिक पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है। हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया था। उनके तीसरी बार चुने जाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्ष के नेताओं ने उन्हें शुभकामनाएं दीं।

प्रधानमंत्री ने की व्यक्तित्व और कार्यशैली की सराहना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदन में हरिवंश नारायण सिंह के योगदान की प्रशंसा करते हुए उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला:

वैचारिक जड़ें: पीएम ने उल्लेख किया कि हरिवंश जी का जन्म लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) के गांव में हुआ है, जिन्होंने आपातकाल के विरुद्ध लोकतंत्र की अलख जगाई थी।

लेखनी और अनुभव: पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ उनके जुड़ाव और एक प्रखर लेखक के रूप में उनकी पहचान का जिक्र करते हुए पीएम ने कहा कि उनके लेखन में स्पष्टता और धार है।

निष्पक्षता का भरोसा: प्रधानमंत्री ने विश्वास जताया कि हरिवंश जी का यह कार्यकाल भी समर्पण और संतुलन का प्रतीक होगा। उन्होंने कहा कि सदन के सभी सदस्य उनकी कार्यशैली का सम्मान करते हैं।

विपक्ष की बधाई और लोकसभा उपाध्यक्ष पद पर सवाल

कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने भी हरिवंश नारायण सिंह को बधाई दी, लेकिन साथ ही सरकार को घेरा। उनके संबोधन के मुख्य बिंदु निम्नलिखित रहे:

लोकसभा में खाली पद: खरगे ने संविधान के अनुच्छेद 93 का हवाला देते हुए कहा कि यह चिंता का विषय है कि लोकसभा में 2019 से उपाध्यक्ष का पद रिक्त पड़ा है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि क्या उस बंद कमरे का दरवाजा खोलने के लिए ‘खुल जा सिम-सिम’ कहना पड़ेगा?

लोकतंत्र और परंपरा: उन्होंने सवाल उठाया कि एक ओर लोकतंत्र की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर वर्षों तक उपाध्यक्ष का चुनाव न होना संवैधानिक भावना के विपरीत है।

विपक्ष की अपेक्षा: अंत में उन्होंने उपसभापति से अनुरोध किया कि सदन की कार्यवाही के दौरान वह विपक्ष के अधिकारों और उनकी बात का विशेष ध्यान रखेंगे।

विशेष तथ्य: हरिवंश नारायण सिंह का निर्विरोध चुना जाना सदन में उनकी स्वीकार्यता को दर्शाता है, जिससे वह तीसरी बार इस प्रतिष्ठित कुर्सी पर आसीन हुए हैं।

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