छत्तीसगढ़

आत्मनिर्भरता की नई मिसाल : माड़वी कोसा ने खुद सीखा हुनर और खड़ा किया अपना पक्का घर

सुकमा। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले का सिलगेर गाँव आज एक प्रेरणादायक बदलाव का गवाह बना है। यहाँ के निवासी श्री माड़वी कोसा, जो कभी एक जर्जर झोपड़ी में असुरक्षित जीवन बिताने को मजबूर थे, आज अपने स्वयं के बनाए पक्के मकान में ससम्मान रह रहे हैं। यह उपलब्धि न केवल एक सरकारी योजना की सफलता है, बल्कि एक व्यक्ति के दृढ़ संकल्प और आत्मनिर्भर बनने की कहानी भी है।

कौशल विकास से मिली नई पहचान

माड़वी कोसा के इस बदलाव में ‘मेरापथ एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड’ द्वारा संचालित रूरल मेसन ट्रेनिंग (ग्रामीण राजमिस्त्री प्रशिक्षण) ने अहम भूमिका निभाई। इस ट्रेनिंग के दौरान कोसा ने न केवल निर्माण की बारीकियां सीखीं, बल्कि इतने सक्षम हो गए कि उन्होंने अपने घर की एक-एक ईंट अपने हाथों से रखी। प्रशिक्षण ने उन्हें एक कुशल कारीगर बनाकर उनके भीतर वह आत्मविश्वास भर दिया जिससे उन्होंने अपने भविष्य की नींव खुद तैयार की।

योजनाओं के संगम से साकार हुआ सपना

इस पक्के आवास के निर्माण में विभिन्न सरकारी योजनाओं का बेहतरीन समन्वय देखने को मिला:

वित्तीय सहायता: प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत उन्हें 1.20 लाख रुपये की स्वीकृति मिली।

मजदूरी सहयोग: मनरेगा के माध्यम से 95 दिनों का रोजगार और ₹23,085 की मजदूरी प्रदान की गई।

बुनियादी सुविधाएं: स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत शौचालय निर्माण के लिए ₹12,000 की राशि दी गई। साथ ही, घर को सौर ऊर्जा (सोलर पैनल) से रोशन किया गया और नल-जल योजना के जरिए स्वच्छ पानी की सुविधा उपलब्ध कराई गई।

मुख्यमंत्री ने थमाई खुशियों की चाबी

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने अपने प्रवास के दौरान श्री कोसा की मेहनत की सराहना की। उन्होंने कोसा से आत्मीय संवाद किया और उन्हें साल-श्रीफल के साथ उनके नए घर की सांकेतिक चाबी सौंपी।

“योजनाओं का सही क्रियान्वयन और कौशल विकास का मेल किसी भी परिवार को आत्मनिर्भर बना सकता है। सिलगेर का यह उदाहरण पूरे जिले के लिए एक मॉडल है।”

— श्री अमित कुमार, कलेक्टर

जिला पंचायत सीईओ श्री मुकुंद ठाकुर ने भी इस सफलता पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि जब हितग्राही खुद हुनरमंद बनता है, तो निर्माण की गुणवत्ता और उसका स्वाभिमान दोनों बढ़ जाते हैं। आज माड़वी कोसा का यह घर केवल ईंट-गारे का ढांचा नहीं, बल्कि संघर्ष से सफलता तक के सफर का प्रतीक बन गया है।

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