अबूझमाड़ के पहाड़ों पर गूंजी ‘अ’ से अनार : मरकाबेड़ा में दशकों बाद पहुंचा शिक्षा का उजियारा

नारायणपुर। छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ क्षेत्र से एक सुखद तस्वीर सामने आई है। जिस इलाके में कभी भय का सन्नाटा पसरा रहता था, वहां अब बच्चों की खिलखिलाहट और किताबों के पन्नों की आवाज सुनाई दे रही है। जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर, दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बसे मरकाबेड़ा गांव में पहली बार प्राथमिक स्कूल की नींव रखी गई है।
दुर्गम रास्तों को मात देकर पहुंची शिक्षा
कलेक्टर नम्रता जैन के नेतृत्व में प्रशासन ने इस असंभव कार्य को संभव कर दिखाया है। ग्राम पंचायत गोमे के अंतर्गत आने वाला यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण है। यहाँ स्कूल शुरू करना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन शिक्षा के प्रति जज्बे ने बाधाओं को पीछे छोड़ दिया।
साहसी पहल: संकुल समन्वयक और शिक्षकों की टीम ने उफनते नालों और ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों को पार कर 2 अप्रैल को गांव में कदम रखा।
क्षेत्रीय लाभ: इस स्कूल के खुलने से मरकाबेड़ा के साथ-साथ कोरोसकोडो जैसे पड़ोसी गांवों के बच्चों को अब पढ़ाई के लिए मीलों पैदल नहीं चलना पड़ेगा।
खुशियों भरा ‘प्रवेश उत्सव’
स्कूल के पहले दिन गांव में उत्सव जैसा माहौल था। शिक्षा की मुख्यधारा से पहली बार जुड़ रहे इन नन्हे हाथों में जब नई किताबें और स्कूल ड्रेस आई, तो उनके चेहरों की चमक देखने लायक थी। प्रशासन द्वारा बच्चों को निम्नलिखित सामग्री वितरित की गई:
निशुल्क गणवेश (यूनिफॉर्म)
नई पाठ्यपुस्तकें
पोषक आहार
“यह स्कूल महज एक भवन नहीं, बल्कि अबूझमाड़ के भविष्य की नई इबारत है। दशकों तक विकास की राह देख रहे इन बच्चों के लिए अब संभावनाओं के द्वार खुल गए हैं।”
विकास की नई दिशा
अबूझमाड़ जैसे संवेदनशील और कटे हुए इलाकों में स्कूल का खुलना इस बात का प्रमाण है कि शांति और शिक्षा के माध्यम से बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। यह पहल न केवल साक्षरता दर बढ़ाएगी, बल्कि क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को भी मजबूती प्रदान करेगी। अब यहां के बच्चे बंदूकों के साये में नहीं, बल्कि कलम की ताकत के साथ बड़े होंगे।
















