देश-विदेश

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद : भारत ने ‘दो-स्तरीय’ स्थायी सदस्यता के विचार को नकारा

नई दिल्ली (एजेंसी)। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार की अपनी दशकों पुरानी मांग को दोहराते हुए भारत ने स्पष्ट किया है कि वह स्थायी सदस्यता में किसी भी प्रकार के ‘दो-स्तरीय’ (Two-Tier) भेदभाव को स्वीकार नहीं करेगा। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि, पर्वतनेनी हरीश ने सुरक्षा परिषद के मौजूदा ढांचे को आउटडेटेड बताते हुए इसमें आमूल-चूल परिवर्तन की वकालत की है।

‘टू-टियर’ व्यवस्था पर भारत की आपत्ति

हालिया चर्चाओं के दौरान भारत ने उस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया, जिसमें नए स्थायी सदस्यों के लिए एक अलग श्रेणी बनाने की बात कही गई थी। इस प्रस्तावित ‘टू-टियर’ व्यवस्था के तहत नए सदस्यों को स्थायी सीट तो मिलती, लेकिन उनके पास पी-5 (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन) की तरह वीटो पावर नहीं होती।

भारत का तर्क है कि: असंतुलित ढांचा: वर्तमान सुरक्षा परिषद 80 साल पुरानी भू-राजनीतिक स्थितियों पर आधारित है, जो आज की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाती।

विभेदकारी नीति: स्थायी सदस्यता में दो अलग-अलग श्रेणियां बनाने से परिषद के भीतर असमानता और बढ़ेगी।

ऐतिहासिक असंतुलन: 1960 के दशक में हुए सुधारों में केवल अस्थायी सीटों की संख्या बढ़ाई गई थी। इससे वीटो रखने वाले पांच देशों की शक्ति तुलनात्मक रूप से और बढ़ गई। भारत का मानना है कि यदि अब स्थायी श्रेणी का विस्तार नहीं किया गया, तो यह असंतुलन और गहरा हो जाएगा।

G4 का लचीला रुख और 15 साल का फॉर्मूला

भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान (G4 समूह) मिलकर सुरक्षा परिषद में विस्तार की मांग कर रहे हैं। चर्चा के दौरान भारत ने ब्राजील के प्रतिनिधि नॉरबर्टो मोरेटी के उस सुझाव का समर्थन किया, जिसमें सुधारों की प्रक्रिया को गति देने के लिए एक ‘मध्यम मार्ग’ अपनाया गया है।

इस प्रस्ताव के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

वीटो पर विलंब: नए स्थायी सदस्य तुरंत वीटो पावर का उपयोग नहीं करेंगे।

समीक्षा अवधि: वीटो के इस्तेमाल पर 15 वर्षों तक रोक रहेगी।

अंतिम निर्णय: 15 साल की समीक्षा अवधि के बाद ही यह तय किया जाएगा कि नए सदस्यों को वीटो का अधिकार कब और कैसे दिया जाए।

पर्वतनेनी हरीश ने जोर देकर कहा कि सुरक्षा परिषद की वैधता और प्रतिनिधित्व को बनाए रखने के लिए स्थायी श्रेणी में विस्तार अनिवार्य है। भारत का रुख साफ है: सुधार केवल प्रतीकात्मक नहीं होने चाहिए, बल्कि वे परिषद के भीतर शक्ति के वास्तविक संतुलन को दर्शाने वाले होने चाहिए।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button